सिटी पोस्ट लाइव
बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे अभियान में निगरानी अन्वेषण ब्यूरो को एक बड़ी और ऐतिहासिक सफलता हाथ लगी है। करीब साढ़े तीन दशक पुराने ‘चीनी मिल गबन कांड’ में मुजफ्फरपुर स्थित विशेष निगरानी अदालत ने बिहार राज्य शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के 6 तत्कालीन अधिकारियों को दोषी करार देते हुए जेल और जुर्माने की सजा सुनाई है। 1990 में हुए इस घोटाले के आरोपियों को सजा मिलने से यह संदेश गया है कि भ्रष्टाचार की फाइलें भले ही पुरानी हो जाएं, लेकिन कानून के हाथ उन तक जरूर पहुंचते हैं।
997 बोरे चीनी का हुआ था ‘खेल’
यह पूरा मामला पश्चिम चम्पारण के बेतिया स्थित लौरिया चीनी मिल से जुड़ा है। सितंबर 1990 में इन अधिकारियों पर पद का दुरुपयोग कर धोखाधड़ी और जालसाजी के जरिए 997 बोरे चीनी के गबन का आरोप लगा था। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने इस मामले की गहन जांच की और अदालत में सटीक आरोप-पत्र दाखिल किया। 35 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार दोषियों को उनके अंजाम तक पहुंचाया गया है।
किसे मिली कितनी सजा?
मुजफ्फरपुर निगरानी न्यायालय के न्यायाधीश श्री दशरथ मिश्रा ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सजा का ऐलान करते हुए तत्कालीन प्रशासन प्रमुख नंद किशोर सिंह और विशेष सहायक उमेश प्रसाद सिंह को दो-दो वर्ष के सश्रम कारावास तथा 10,000 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई, जबकि लिपिक लालबाबू प्रसाद, सुशील कुमार श्रीवास्तव, लेखा पदाधिकारी अजय कुमार श्रीवास्तव और चीनी बिक्री प्रभारी धीरेन्द्र झा को अधिक दोषी मानते हुए तीन-तीन वर्ष के सश्रम कारावास एवं 25,000 रुपये जुर्माने की सजा दी।
इस पूरे मामले में बिहार सरकार की ओर से विशेष लोक अभियोजक श्री कृष्णदेव साह ने अत्यंत प्रभावी ढंग से पैरवी की, जिसके परिणामस्वरूप आरोपियों को बचने का कोई भी मौका नहीं मिल सका।
भ्रष्टाचार पर निगरानी का प्रहार
निगरानी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में अब तक कुल 30 भ्रष्टाचार के मामलों में न्यायालय द्वारा सजा सुनाई जा चुकी है, जो विभाग की सक्रियता को दर्शाता है। ब्यूरो ने इस फैसले के बाद जनता से अपील की है कि यदि कोई भी सरकारी सेवक रिश्वत की मांग करता है, तो टोल फ्री नंबर या विभाग के हेल्पलाइन नंबर 0612-2215344 पर तुरंत शिकायत दर्ज कराएं।यह फैसला उन सभी लोक सेवकों के लिए एक सबक है जो पद की गरिमा भूलकर सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग करते हैं।