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चिराग को अभी भी है मोदी से संरक्षण की उम्मीद.

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सिटी पोस्ट लाइव :राम विलास पासवान के निधन के एक साल के अंदर ही उनकी बनाई पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी दो गुटों में बंट गई है. एक गुट की कमान उनके बेटे चिराग पासवान के हाथों में है जबकि दूसरे गुट की कमान राम विलास पासवान के छोटे भाई पशुपति कुमार पारस के हाथों में हैं..चिराग पासवान अपने राजनीतिक जीवन के सबसे मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं . उन्हें किसी दूसरे से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि उनके अपने ही उनका साथ छोड़ कर गए हैं.

 

चिराग पासवान का कहना है कि पाँच सांसद ज़रूर अलग हुए हैं लेकिन हमारी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 75 सदस्य हैं और उनमें 66 लोग हमारे साथ हैं. मेरी राजनीतिक हत्या कराने की कोशिश है और पार्टी के अंदर कुछ मुट्ठी भर लोग कर रहे हैं जो मेरे पिता के सपनों को पूरा होते नहीं देखना चाहते हैं.चिराग कहते हैं जब अपने ही मेरे साथ नहीं हैं तो फिर दूसरों से क्या ही शिकवा. पिता जी के निधन के बाद चाचा जी में जो परिवर्तन देखा है, उसकी कभी कल्पना नहीं की थी. उन्होंने पार्टी को तोड़ने का प्रयास पिता जी के रहते भी किया था. जिन सांसदों के विरोध करने की बात हो रही थी, उनमें उनका भी नाम था. पिताजी के निधन के बाद उन्होंने बात करनी बंद कर दी. अगर उन्हें अध्यक्ष बनना था या केंद्र में मंत्री बनने की इच्छा थी, तो मुझसे कहते हैं, ‘मैं ख़ुद उनके नाम का प्रस्तावक बनता है.’

 

मेरे पार्टी के मुट्ठी भर लोग मेरे पिता जी के विचारों के साथ समझौता करके उन लोगों के साथ जाकर खड़े हो गए हैं जो मेरे पिता की राजनीतिक हत्या कराना चाहते थे. मैं नीतीश कुमार की बात कर रहा हूं. पहली बार हमारी पार्टी में टूट नहीं कराई है. 2005 में हमारे 29 विधायक जीतकर आए थे, उन्हें तोड़ा. नवंबर, 2005 में चुनाव हुआ, उसमें तोड़ा. गाहे बगाहे एमएलसी को तोड़ा. इस बार एक विधायक जीत कर आए, उन्हें भी तोड़ लिया. नीतीश कुमार हमेशा मेरे पिता के राजनीतिक क़द को कम करने की कोशिश करते रहे. दलित-महादलित का विभाजन भी उन्होंने इसी सोच के साथ कराया था.

 

मुझे 15 सीट मिल रहे थे, छह सांसदों की पार्टी को महज़ 15 सीटें मिल रही थीं, अगर मैं मान लेता तो दो मंत्री तो बिहार में होते ही, और केंद्र में मैं मंत्री बन चुका होता. अगर मेरी अपनी महत्वकांक्षा होती, तो वहां एनडीए में रहना मेरे लिए बेहतर होता. मेरा सवाल बिहार के सात निश्चय प्रोग्राम को लेकर भी था क्योंकि वह प्रोग्राम तो महागठबंधन का था, वह प्रोग्राम तो एनडीए का था भी नहीं. मैं बिहार फ़र्स्ट और बिहारी फ़र्स्ट के अपने विज़न की बात कर रहा था जिस पर नीतीश जी का कोई ध्यान नहीं था.

 

मेरे चाचा और मेरे भाई ने मेरा साथ छोड़ दिया तो दूसरों पर क्या ऊंगली उठाऊं? हां, मुझे इस बात का दुख ज़रूर है कि जब मुझे संरक्षण की ज़रूरत है, तब मुझे वह नहीं मिल रहा है. हालांकि मैंने पूरी ईमानदारी से एक हनुमान की तरह अपनी भूमिका निभाई है. रामायण में जिस तरह से हनुमान ने माता सीता की खोज से लेकर लंका जलाने का काम किया था, उसी तरह से मैं प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के हर फ़ैसले में उनके साथ खड़ा रहा. चाहे वह धारा 370 की बात हो, चाहे ट्रिपल तलाक़ की बात हो चाहे एनआरसी की बात हो या राम मंदिर की बात हो, ये तमाम बड़े मुद्दे हैं जिसमें नीतीश कुमार जी ने केंद्र सरकार का विरोध किया है. सीएए-एनआरसी पर तो उन्होंने बिहार विधानसभा में प्रस्ताव पारित कराया था.मेरी उम्मीद क़ायम है, आज नहीं तो कल आदरणीय प्रधानमंत्री जी का संरक्षण मुझे मिलेगा. हालांकि बीजेपी नेताओं की चुप्पी ज़रूर मुझे दुखी करती है. लेकिन मेरा विश्वास है कि ‘जब हनुमान का वध हो रहा होगा तो राम ख़ामोशी से नहीं देखेंगे.’

 

मैंने हमेशा कहा है कि तेजस्वी यादव मेरे छोटे भाई हैं. मेरे पिता और उनके पिता अच्छे दोस्त रहे हैं, लंबे समय तक साथ काम किया है, तो हम लोगों के बीच संवाद होता रहा है. ऐसा नहीं है कि अभी जो प्रकरण है उसके चलते बातचीत हो रही है. पिता जी से सीखा है कि हर जगह उनके मित्र होते थे.केवल विपक्ष के नेताओं से बात नहीं हो रही है, बीजेपी के नेताओं के भी फ़ोन आए हैं, हालांकि ऑफ़िशियली वे सामने नहीं आए हैं. किसी से बातचीत के आधार पर यह कहना कि गठबंधन बदल रहा हूं या उनके साथ जा रहा हूं, ये ग़लत है.

 

चिराग जिस दौर में गुज़र रहे हैं, उसकी कल्पना शायद उन्होंने कभी नहीं की थी, लिहाज़ा चाचा पशुपति कुमार पारस और चचेरे भाई प्रिंस राज की खुली बग़ावत के बाद भी वे कहते हैं, “मुझे तो यक़ीन ही नहीं हो रहा है कि मेरे अपनों ने ऐसा धोखा दिया है, अगर इन लोगों को मेरे व्यवहार से कोई शिकायत थी, तो मेरी मां से बात कर सकते थे.”हालांकि वे स्पष्टता से यह भी इरादा ज़ाहिर करते हैं कि राम विलास पासवान की पार्टी और उनकी विरासत को बचाने की लड़ाई में वे कोई कसर नहीं रखेंगे.

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