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जातीय जनगणना के जरिये मंडल-कमंडल की राजनीति.

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सिटी पोस्ट लाइव : बीजेपी के हिंदुत्व के अजेंडे से बिहार के क्षेत्रीय दलों की नींद उड़ी हुई है.हिंदुत्व के नाम पर बीजेपी ने हर जातियों के बीच अपनी पैठ बढ़ा ली है.बीजेपी के इस हिंदुत्व के अजेंडे की काट केवल मंडल-2 से ही संभव है.इसी बात को ध्यान में रखते हुए बीजेपी के कमंडल की काट के लिए मंडल -2 की व्यूह रचना में विपक्ष जुटा हुआ है.बिहार सरकार इसी मकसद से बिहार में जातीय जनगणना करवा रही है.लेकिन पटना हाईकोर्ट ने 4 अप्रैल को बिहार में चल रहे जातीय गणना पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाकर बिहार की सियासत में भूचाल ला दिया है.

सवाल ये  उठने लगे हैं कि जिस राज्य की 52% आबादी गरीब हैं. 73% से ज्यादा आबादी को अपना छत नसीब नहीं है  वहां के नेता जाति आधारित गणना कराने के लिए इतनी जिद क्यों कर रहे हैं…? इसके पीछे का राज क्या है…? ऐसा होने से फायदा क्या है?दरअसल, बीजेपी ने  हिंदुत्व की एक नई लकीर से एक नया वोट बैंक तैयार किया है. इसमें सभी वर्गों के वोटर्स शामिल हैं. उस वोट बैंक टक्कर देने, उनमें सेंधमारी करने के लिए ये जातीय आधार को आगे किया जा रहा है. जातीय गणना का मकसद ही यही है कि जातियों को गोलबंद किया जाए. 2024 लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर से मंडल बनाम कमंडल करने की कोशिश की जा रही है.

इसका सीधा लाभ जातीय आधार पर बिहार में राजनीति कर रहे  राजनीतिक दलों को मिलेगा. इससे उनका नया वोट बैंक तैयार होगा.कहा जा रहा है कि जातीय गणना होगा तो पिछड़ी जातियों के जीवन स्तर में सुधार होगा. उनका विकास होगा, लेकिन ये सब केवल एक प्रॉपेगेंडा है. अगर ऐसा ही होता तो अलग-अलग आयोगों ने जो अनुशंसा की, उन्हें क्यों नहीं लागू किया जा रहा है?हाईकोर्ट का फैसला आने तक जाति आधारित गणना का काम 80% पूरा कर लिया गया है. इनके आंकड़े भी सरकार के पास आ गए होंगे, लेकिन दिक्कत ये है कि सरकार इसे सार्वजनिक नहीं कर सकती. ऐसे में सरकार जब तक आंकड़े सार्वजनिक नहीं करेगी, इन्हें वोट में परिवर्तित करने में परेशानी आएगी. एक्सपर्ट का मानना है कि यही वजह है कि समाजवादी धारा के दो दल राजद और जेडीयू कोर्ट के फैसले के बाद आहत है.

इस बीच एक चर्चा इस बात की भी हो रही है कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद भले सरकार की किरकिरी हुई हो, लेकिन नीतीश कुमार कामयाब जरूर हुए हैं. अपने इस फैसले के बाद लोगों के बीच मुख्यमंत्री ये मैसेज देने में कामयाब हो गए हैं कि वे ओबीसी वर्ग के हितैषी हैं. वो उनके सही आंकड़ों को जुटाने और उन्हें उचित हिस्सेदारी दिलाने के अभियान में जुटे थे. कोर्ट के फैसले के कारण इसमें ब्रेक लग गया. एक्सपर्ट मानते हैं कि इसका लाभ उन्हें चुनाव में मिल सकता है.

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार में आरक्षण का मामला काफी संवेदनशील है. 2015 विधानसभा चुनाव से पहले RSS प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाली बात से पूरा मामला पलट गया था. यही कारण है कि यहां सत्ता पक्ष हो या विपक्ष आरक्षण के मसले पर सब एकजुट हैं. इसमें लोगों को फायदा कम, नेताओं का अपना हित ज्यादा है. उनको इस मुद्दों को हवा देते ही विकास, महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मसलों पर जवाब देना नहीं पड़ता है.

आजादी के बाद पहली बार 1951 में जनगणना हुई. तब से अब तक हुई सभी 7 जनगणना में SC और ST का जातिगत डेटा पब्लिश होता है, लेकिन बाकी जातियों का डेटा पब्लिश नहीं होता. डेटा नहीं होने के कारण OBC आबादी का ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता है.देश में SC और ST वर्ग को जो आरक्षण मिलता है, उसका आधार उनकी आबादी है, लेकिन OBC आरक्षण का कोई मौजूदा आधार नहीं है. अगर जाति आधारित गणना होगी तो इसका ठोस आधार होगा. दावा है कि ऐसा होने के बाद पिछड़े-अति पिछड़े वर्ग के लोगों की शैक्षणिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति का पता चलेगा. उनकी बेहतरी के लिए बेहतर पॉलिसी बन सकेगी.

गृह मंत्रालय ने बजट सत्र में राज्यसभा और मानसून सत्र में लोकसभा में इस तरह की जनगणना से इनकार किया है. जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा था, ‘हर बार की तरह इस बार भी केवल SC और ST कैटेगरी की जातिगत जनगणना होगी.हालांकि, 31 अगस्त 2018 को तात्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने 2021 की जनगणना की तैयारियों पर मीटिंग की थी. इसके बाद PIB ने जानकारी दी थी कि इस बार की जनगणना में OBC की गणना के बारे में सोचा जा रहा है.

जब भाजपा विपक्ष में थी तब उसके ही नेताओं का रुख कुछ और था. 2011 की जनगणना से पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने जातिगत जनगणना की मांग की थी. उन्होंने 2010 में संसद में कहा था कि अगर हम 2011 की जनगणना में OBC की गणना नहीं करेंगे, तो हम उन पर अन्याय करेंगे.UP-बिहार में OBC का बड़ा हिस्सा क्षेत्रीय दलों का समर्थक है. पिछले चुनावों में BJP की लोकप्रियता बढ़ी है, लेकिन उनकी तुलना में वो कम है. BJP की जितनी मजबूत पैठ सवर्ण जातियों में है, उतना OBC के बीच नहीं है. जातिगत गणना होगी तो क्षेत्रीय दलों को केंद्र की नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में OBC कोटे में बदलाव के लिए सरकार पर दबाव बनाने का मुद्दा मिल जाएगा. देश में मंडल-2 जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है. इस बहाने सिमटती क्षेत्रीय पार्टियों को नया जीवन मिल सकता है.

2011 की जनगणना के दौरान UPA सरकार ने लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव के दबाव और कांग्रेस के पिछड़ी जाति के नेताओं की चाहत के कारण सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना (SECC) कराई थी. इसके लिए 4,389 करोड़ रुपए का बजट पास हुआ. 2016 में जाति को छोड़कर SECC का बाकी डेटा मोदी सरकार ने जारी कर दिया.जातियों का रॉ डेटा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को सौंप दिया गया. जातियों के कैटेगराइजेशन और क्लासिफिकेशन के लिए मंत्रालय ने नीति आयोग के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में एक कमेटी बना दी. हालांकि, इस रिपोर्ट का क्या हुआ पता नहीं.

जब भी जातीय गणना के बारे में बात होती है कर्नाटक मॉडल का जिक्र जरूर आता है. सिद्धरमैया सरकार ने 2014 में जातीय गणना शुरू की थी. विरोध हुआ तो नाम बदलकर सामाजिक और आर्थिक सर्वे कर दिया. 2017 तक गणना पूरी करा ली गई, लेकिन इसकी रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं हुई है. बताया जाता है कि इसमें 192 से अधिक नई जातियां सामने आ गई.

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