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फिर से नीतीश जीत पायेगें अल्पसंख्यकों का भरोसा?

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सिटी पोस्ट लाइव : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अगर एक लम्बे अरसे से बिहार की राजनीति में एक बैलेंसिंग फैक्टर बने हुए हैं उसकी वजह केवल उनका ‘लव-कुश” समीकरण ही नहीं बल्कि उनका सेक्युलर क्रेडेंशियल भी है.नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी के विरोध में जब 20 14 में बीजेपी का साथ छोड़ा था तब वो अल्पसंख्यकों के हीरो बन गये थे.उन्हें चुनाव में अल्पसंख्यकों का जोरदार समर्थन मिला था.लेकिन फिर से उनके बीजेपी के साथ जाने फिर बीजेपी को छोड़कर आरजेडी के साथ आने, फिर एकबार आरजेडी को छोड़कर बीजेपी के साथ जाने और अब लोक सभा चुनाव के पहले फिर से आरजेडी के साथ आ जाने से अल्पसंख्यक दुविधा में हैं.सबसे बड़ा सवाल क्या-आरजेडी के साथ आने के बाद उन्हें फिर से अल्पसंख्यकों का पहले वाला जोरदार समर्थन मिल पायेगा?

 

शुक्रवार को अपने आवास पर बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने इफ्तार की दावत दी. महागठबंधन के नेताओं के अलावा खासी तादाद में मुस्लिम समुदाय के लोग भी जुटे. नीतीश को अब भी आस है कि साथ छोड़ चुके मुसलमान फिर उनके साथ आएंगे. बदले हालात में यह संभव भी हो सकता है. नीतीश कुछ महीनों को छोड़ कर लगातार बीजेपी के साथ रहे. अब आरजेडी के साथ हैं. ये अलग मसला है कि नीतीश कुमार पर अल्पसंख्यक समुदाय का साथ नीतीश कुमार को 20 14 के बाद नहीं मिला है.

 

वर्ष 2018 में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) का पटना जिला अल्पसंख्यक सम्मेलन श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में हुआ था. आयोजकों को उम्मीद थी कि कार्यक्रम में भारी संख्या में अल्पसंख्यक हिस्सा लेंगे. आरंभ से अंत तक हाल की अधिकतर कुर्सियां खाली रहीं. बिहार के तत्कालीन अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री खुर्शीद उर्फ फिरोज अहमद ने इसके लिए सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी.विपक्ष का कहना है कि नीतीश कुमार चाहे मजार पर चादरपोशी करें या इफ्तार पार्टियों में शिरकत, अल्पसंख्यकों के मन में पहले जैसा उनके प्रति प्रेम नहीं रह गया है. वह लाख सफाई दे लें या बार-बार बयान दें कि कम्युनलिज्म से कोई समझौता कभी नहीं करेंगे, चाहे उनके साथ कोई भी रहे, इसका कोई खास असर अल्पसंख्यकों के मन मिजाज पर पड़ता नहीं दिख रहा है.

 

नीतीश कुमार अगर हर बार कामयाब होते रहे तो अल्पसंख्यकों का उनके प्रति भरोसा भी इसका एक बड़ा कारण रहा. कभी कांग्रेस के कट्टर समर्थक अल्पसंख्यक कालांतर में राजद के साथ हो गये थे. लेकिन नीतीश कुमार ने कई मौकों पर अपने आचरण और वाणी से यह भरोसा दिलाया कि वह अल्पसंख्यकों को नहीं छोड़ सकते. वह अवसर चाहे नरेंद्र मोदी का गुजरात के मुख्यमंत्री होने के नाते बाढ़ राहत का बिहार को भेजा गया पैसा लौटाने का हो या उनके साथ भोज रद्द करना, नीतीश ने अल्पसंख्यकों की भावनाओं को तरजीह हमेशा ही दी. नरेंद्र मोदी को बीजेपी ने जब प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया तो नीतीश ने भाजपा से रिश्ता ही तोड़ लिया. उनके इन कदमों को अल्पसंख्यकों ने सिर आंखों पर रखा और लगातार उन्हें अपना समर्थन दिया.

 

लेकिन तब मुस्लिम समाज के पास और कोई विकल्प नहीं था.अब उन्हें युवा तुर्क के रूप में तेजस्वी यादव का विकल्प मिल चूका है.वे आरजेडी की ओर दोबारा मुखातिब हो चुके हैं. नीतीश के सारे मुस्लिम उम्मीदवार 2020 के विधानसभा चुनाव में हार गए. तेजस्वी की पार्टी से 8 ने जीत दर्ज की. यानी मुस्लिम अब नीतीश से अधिक तेजस्वी को तरजीह देते हैं. 2020 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू से कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीता, जबकि आरजेडी से 8 मुसलमान विधायक चुने गए थे. मुस्लिम विधायकों की जीत के मामले में दूसरे नंबर पर ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम रही. उसके 5 मुस्लिम विधायक जीते थे. कांग्रेस पार्टी के 4 और एक-एक मुस्लिम विधायक सीपीआई (एम) और बीएसपी से जीते. जेडीयू ने 11 मुस्लिम कैंडिडेट को टिकट दिया था, लेकिन कोई भी जीत हासिल नहीं कर पाया.

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