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सियासी धर्म संकट से उबरने में कामयाब हो जाते हैं हरिवंश.

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सिटी पोस्ट लाइव :  अपनी पार्टी  के सांसद और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जो बीजेपी के काफी करीब हो चुके हैं, उनके खिलाफ आखिरकार नीतीश कुमार क्यों कोई एक्शन नहीं ले पा रहे हैं? हरिवंश के अब तक के कार्यकाल में दो ऐसे मौके आए, जब उनके सामने धर्म संकट की स्थिति उत्पन्न हुई. पहली बार अगस्त 2022 में संकट तब आया, जब नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने एनडीए से नाता तोड़ लिया. सबकी निगाहें हरिवंश पर टिकी थीं कि वे क्या करेंगे या जेडीयू उनके साथ क्या सलूक करेगा ? राज्यसभा के उपसभापति पद पर वे बने रहेंगे या छोड़ देंगे.  नीतीश कुमार  हरिवंश को उपसभापति का पद छोड़ने के लिए कहते तो शायद हरिवंश तैयार भी नहीं होते.उनके सामने सीपीएम लीडर सोमनाथ चटर्जी का उदाहरण था. यूपीए सरकार के दौरान लोकसभा का स्पीकर रहे सीपीएम लीडर सोमनाथ चटर्जी ने जब यूपीए का साथ दिया तो सीपीएम ने उन्हें पार्टी से ही निकाल दिया था. इसकी परवाह किए बगैर वे स्पीकर के पद पर बने रहे.

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर जैसे  कुछ लोग मानते हैं कि कभी एनडीए तो कभी महागठबंधन में आवाजाही करते रहने वाले नीतीश एनडीए में एक खिड़की खुला रखना चाहते थे. हाल के दिनों में नीतीश कुमार जब अपने वर्तमान और पूर्व विधायकों-सांसदों से मिल रहे थे तो अचानक हरिवंश भी एक शाम पटना पहुंच गए. उन्होंने नीतीश कुमार से अकेले में मुलाकात की. उसके बाद भी यह अफवाह उड़ी कि नीतीश कुमार एनडीए में अपनी जगह बनाए रखने के लिए हरिवंश का सहारा ले रहे हैं. हालांकि इस मुलाकात के बारे में न नीतीश कुमार ने कभी कोई टिप्पणी की और न हरिवंश ने ही अब तक किसी को कुछ बताया है.

हरिवंश के सामने दूसरा धर्म संकट संसद के नये भवन के उद्घाटन के समय आया. उनकी पार्टी जेडीयू ने विपक्षी दलों के साथ संसद के नये भवन के उद्घाटन समारोह के बायकाट का फैसला किया.लेकिन हरिवंश उद्घाटन समारोह में न सिर्फ शामिल हुए, बल्कि महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई. एक और मौके पर हरिवंश विवादों में आए. जब राज्यसभा से कृषि बिल पास हुआ तो तत्कालीन गैर एनडीए दलों ने इसके लिए हरिवंश को जिम्मेवार ठहराया था. विरोधियों का आरोप था कि हरिवंश ने पक्षपात किया. हालांकि तब जेडीयू भी एनडीए का ही हिस्सा था. इसलिए उसकी ओर से तो तब सवाल खड़ा करने की गुंजाइश ही नहीं थी. लेकिन दूसरे विपक्षी दलों ने हरिवंश की खूब लानत-मलामत की.

हरिवंश के सामने सबसे बड़ा धर्म संकट दिल्ली सरकार के सेवा बिल को लेकर था. संसद के मानसून सत्र के दौरान सभापति जगदीप धनखड़ लगातार राज्यसभा में सदारत करते रहे. इसकी वजह से हरिवंश को सदन चलाने का अवसर ही नहीं मिलता था. जेडीयू अब विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A का हिस्सा है.  जब I.N.D.I.A ने सेवा बिल के विरोध में मतदान का निर्णय लिया तो जेडीयू ने अपने सदस्यों को व्हीप जारी कर दिया. व्हीप के दायरे में हरिवंश भी आए. अगर सदन की कार्यवाही का संचालन धनखड़ कर रहे होते तो हरिवंश के सामने भी वोट करने की नौबत आती. इसे संयोग कहें या बीजेपी की रणनीति कि बिल पर वोटिंग के दौरान हरिवंश सदन का संचालन करने लगे. ऐसे में उनके वोटिंग की नौबत ही नहीं आई. उनको यह अवसर तब मिलता, जब टाई की स्थिति आती. लेकिन बिल 31 मतों के अंतर से पास हो गया.

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