अनंत सिंह की कथा अनंता, सन्यासी बनना चाहते थे लेकिन कैसे बन गये अपराधी….

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सिटी पोस्ट लाइव : कहावत है- मोकामा में आधी रात में भी गहनों से लदी नई-नवेली दुल्हन को कोई छेड़ नहीं सकता.मोकामा में एक पत्ता भी बगैर अनंत सिंह के इजाजत के नहीं हिलता.अच्छा हो या बुरा काम सब अनंत सिंह की मर्जी से होता है. 1975 में तस्करी से तस्करी ,हत्या, हथियारों की सप्लाई, रंगदारी से अपने करियर की शुरुवात करनेवाले अनंत सिंह के  रेलवे टेंडर में बादशाहत कायम करने तक की कहानी बहुत दिलचस्प है.बाहुबली अनंत सिंह और सोनू-मोनू की अदावत से एक बार फिर मोकामा चर्चा में है.

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दोनों जेल में बंद हैं तो इलाके में फिलहाल शांति है.लेकिन मोकामा के लोगों का मानना है कि ये शान्ति किसी बड़े तूफ़ान के आने का संकेत है.अनंत सिंह और सोनू-मोनू के  जेल जाने से संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ है.यह एक छोटा सा ब्रेक है.1970-71 में  नदवां गांव के चंद्रदीप सिंह के बेटे दिलीप सिंह टमटम चलवाया करते थे. इसी दौरान उनकी मुलाकात तस्कर कामदेव से हुई. कामदेव भारत से नेपाल सामान की तस्करी करता था. उससे धीरे-धीरे दिलीप सिंह की नजदीकी बढ़ी और उसका राइट हैंड हो गए. कुछ दिन बाद कामदेव की हत्या हो गई. और उसकी कुर्सी पर दिलीप सिंह ने कब्जा कर लिया.1975 आते-आते उनका पूरे मोकामा एरिया में दबदबा हो गया. क्राइम की दुनिया में दिलीप सिंह बड़े नाम हो गए थे, लेकिन रिकॉर्ड में उनके खिलाफ कोई संगीन मुकदमा दर्ज नहीं था.

80 के दशक में जब राजनेता अपनी जीत के लिए बाहुबल का सहारा लेते थे.  1980 विधानसभा चुनाव में श्याम सुंदर सिंह धीरज कांग्रेस के सीताराम केसरी गुट से चुनाव लड़ रहे थे. जगन्नाथ मिश्र उन्हें हराना चाहते थे.कांग्रेस की आंतरिक सियासत से उबरने के लिए तब पहली बार श्याम सुंदर सिंह धीरज ने इलाके के दबंग दिलीप सिंह की मदद ली. उन्होंने खुलकर सपोर्ट किया और धीरज चुनाव जीत गए. मोकामा के जानकारों की मानें तो ये औपचारिक तौर पर यहां की सियासत में बाहुबलियों की एंट्री थी. श्याम सुंदर सिंह धीरज को 1985 का चुनाव जीताने के बाद एक बार दिलीप सिंह उनसे मिलने पटना के सरकारी आवास में चले गए थे. इस पर उन्होंने मिलने से मना कर दिया.तब उन्होंने दिलीप सिंह से कहा था, “दिन के समय मिलने मत आया करो. तुम कोई शरीफ आदमी या अधिकारी तो हो नहीं. शाम होने के बाद आया करो और वो भी छुपकर.

ये बात दिलीप सिंह को इतनी चुभी कि उन्होंने श्याम सुंदर सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया. 1990 विधानसभा चुनाव में दिलीप सिंह से श्याम सुंदर सिंह धीरज 20 हजार से ज्यादा वोट से हार गए. इसके बाद 1995 के चुनाव में भी हारे. तब लालू यादव ने इनाम के तौर पर दिलीप सिंह को मंत्री बना दिया.खास बात है कि पहली बार जब श्याम सुंदर सिंह धीरज चुनाव हारे तो उन्होंने दिलीप सिंह के शागिर्द सूरजभान सिंह को तोड़ लिया. और दोनों को एक-दूसरे के खिलाफ कर दिया.

मूल रूप से मोकामा में जन्मे सूरजभान के पिता एक किराना दुकान में काम करते थे. दिलीप सिंह के शागिर्द बन 80 के दशक में इन्होंने क्राइम की दुनिया में एंट्री की. कहा जाता है कि जहां सूरजभान के पिता काम करते थे उसी कारोबारी से उन्होंने रंगदारी मांग ली थी. तब छोटे-मोटे क्राइम करने वाले सूरजभान 90 का दशक आते-आते जुर्म की दुनिया में बड़े नाम बन गए.इन पर हत्या, लूट, अपहरण के एक के बाद एक मामले दर्ज होते चले गए. कद के साथ सूरजभान अपना दायरा भी बढ़ाते चले गए. मोकामा से निकलकर बिहार, झारखंड से लेकर यूपी तक में इन्होंने अपना साम्राज्य स्थापित किया.

क्राइम की दुनिया में सूरजभान को आगे बढ़ाने का श्रेय कांग्रेस के पूर्व विधायक श्याम सुंदर सिंह धीरज और अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह को ही दिया जाता है.सूरजभान रेलवे टेंडर और ठेकेदारी में अपना वर्चस्व कायम करना चाहते थे. वे इसमें सफल भी हुए. 90 के दशक में बिहार से लेकर झारखंड तक रेलवे के हर टेंडर पर इनका कब्जा होता था. UP में भी ये ऐसा करना चाहते थे, लेकिन वहां इनकी राह का रोड़ा बाहुबली हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही थे.

90 के दशक में बिहार के दो बाहुबली अशोक सम्राट और सूरजभान की दुश्मनी का किस्सा सरेआम था. अशोक सम्राट नेताओं को अपना संरक्षण देता था. इसके सहारे वो बिहार से लेकर UP तक अपना वर्चस्व कायम करना चाहता था. उसके वर्चस्व को सूरजभान सिंह चुनौती दे रहे थे.सूरजभान सिंह पर राबड़ी सरकार में मंत्री रहे बृज बिहारी प्रसाद की हत्या का आरोप लगा. निचली अदालत ने उन्हें इस मामले में सजा भी सुनाई, लेकिन बाद में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया.

जुर्म की दुनिया में अपना पैर जमाने के बाद 2000 में सूरजभान सिंह ने सियासत की दुनिया में कदम रखा. उन्होंने मोकामा से 2000 में तत्कालीन बिहार सरकार के मंत्री दिलीप सिंह के खिलाफ जेल से ही पर्चा भरा. अपने पहले चुनाव में ही दिलीप सिंह को 70 हजार वोट से हरा दिया था. उस वक्त सूरजभान पर पुलिस रिकॉर्ड में UP और बिहार में कुल 26 मामले दर्ज थे. विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद 2004 में वह रामविलास पासवान की लोकजन शक्ति पार्टी के टिकट से बलिया (बिहार) के सांसद बने.

अनंत सिंह बाहुबली दिलीप सिंह के छोटे भाई हैं. कहा जाता है कि ये क्राइम की दुनिया में नहीं आना चाहते थे. हालात ऐसे बने कि दिलीप सिंह के बाद उनकी क्राइम और पॉलिटिक्स दोनों की बागडोर अनंत सिंह को संभालनी पड़ी.अनंत सिंह के बारे में कहा जाता है कि जवानी के दिनों में ये साधु बनने की चाहत रखते थे. इसके लिए वह हरिद्वार भी भाग कर गए. लेकिन वहां साधुओं के साथ ही मुठभेड़ करने लगे. खुद से ज्यादा साधुओं की आपसी लड़ाई देखकर उनका मन वैराग्य की दुनिया से उचट गया.इसी बीच उनके सबसे बड़े भाई बिरंची सिंह की हत्या हो गई.बैरागी बनने गए अनंत सिंह के सिर पर अपने भाई की हत्या का बदला लेने का भूत सवार हो गया. बाद में उन्होंने हत्यारों को ढूंढ कर मारा और भाई का बदला लिया.

अनंत सिंह क्राइम की दुनिया में तेजी से बढ़ रहे थे. उनका इस तरह आगे बढ़ना उनके पड़ोसी विवेका पहलवान को रास नहीं आया. दोनों एक-दूसरे के दुश्मन बन गए. दोनों के घर की दीवार एक जरूर थी, लेकिन दोनों एक-दूसरे का जान लेने को आतुर थे. दोनों के बीच वर्षों तक खूनी संघर्ष चला.90 के दशक में जातियों के खूनी संघर्ष में जलते बिहार में अनंत सिंह की पहचान भूमिहार रक्षक की थी. 2004 आते-आते अनंत सिंह इलाके के बाहुबली बन चुके थे. इनका सिक्का चलने लगा था. उनके बारे में कहा जाता है कि वे अपने दरवाजे पर मदद के लिए आए बेटी के पिता को कभी निराश नहीं करते.

अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह को हराकर 2000 में सूरजभान विधायक बने थे. इसके बाद दिलीप सिंह का प्रभाव कम होने लगा. 2003 में विधान परिषद चुने गए थे, लेकिन अक्टूबर 2006 में पटना में हार्ट अटैक से निधन हो गया.2004 लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने अनंत सिंह की मदद ली. इसका फायदा उन्हें 2005 के विधानसभा चुनाव में मिला. JDU ने अनंत सिंह को मोकामा से उम्मीदवार बना दिया. तब उन्होंने सूरजभान के समर्थित लोजपा के नलिनी रंजन शर्मा उर्फ ललन सिंह को हराकर राजनीति में जीत का ताज पहना. इसके बाद से आज तक मोकामा सीट पर इनका कब्जा है.अनंत सिंह के 2020 विधानसभा चुनाव के दायर हलफनामे के मुताबिक, उन पर हत्या की कोशिश के 11 और जान से मारने की धमकी के 9 केस सहित 38 FIR दर्ज हैं.

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