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पटना। बिहार कांग्रेस में बड़ा बदलाव हुआ है। अखिलेश प्रसाद सिंह अब पूर्व अध्यक्ष हो चुके हैं, और उनके स्थान पर राजेश कुमार ने कमान संभाल ली है। इसके बाद, एनएसयूआई के राष्ट्रीय प्रभारी कन्हैया कुमार और नए अध्यक्ष राजेश कुमार के बीच लंबी बातचीत हुई। यह किसी से छिपा नहीं है कि कन्हैया कुमार और अखिलेश प्रसाद सिंह के बीच संबंध हमेशा तनावपूर्ण रहे हैं।
राजनीतिक समीकरण की बात करें तो अखिलेश प्रसाद सिंह को राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का करीबी माना जाता था, जबकि कन्हैया कुमार और लालू परिवार के बीच हमेशा टकराव की स्थिति रही है। लालू प्रसाद को लगता था कि कन्हैया, तेजस्वी यादव के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकते हैं। लेकिन अब, अखिलेश का दौर खत्म हो चुका है, और कांग्रेस पर लालू की पकड़ कमजोर हो गई है।
कन्हैया और नए अध्यक्ष की रणनीति
राजेश कुमार को अध्यक्ष पद तक पहुंचाने में कन्हैया कुमार की अहम भूमिका रही है। दोनों के बीच राजनीतिक तालमेल भी काफी मजबूत दिख रहा है। इस बैठक में कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई, जिसमें सबसे बड़ा मुद्दा था – आठ साल से लंबित प्रदेश कमेटी का गठन और कांग्रेस के दो बिछड़े विधायकों को वापस लाना।
बिहार विधानसभा में कांग्रेस के 19 विधायक हैं, लेकिन इनमें से दो – सिद्धार्थ सौरव और मुरारी गौतम – पिछले साल से पार्टी से दूर हैं। नीतीश सरकार के विश्वास मत के दौरान ये दोनों विधायक कांग्रेस लाइन से अलग हो गए थे। पूर्व अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह इन्हें सबक सिखाने के पक्ष में थे और इनके खिलाफ विधानसभा अध्यक्ष को अयोग्यता की अर्जी भी दी गई थी, जो अब तक लंबित है। लेकिन नया नेतृत्व इन्हें वापस लाने की कोशिश कर रहा है।
पप्पू यादव की एंट्री और नई तिकड़ी
अखिलेश सिंह की विदाई से पप्पू यादव काफी खुश हैं। उन्हें लगता है कि अब पार्टी में उनके सुझावों को महत्व मिलेगा। पहले, अखिलेश सिंह उन्हें लगातार किनारे करते थे, लेकिन अब उनका कन्हैया कुमार से अच्छा तालमेल है और कन्हैया का राजेश कुमार से। इस तरह, कांग्रेस में कन्हैया, राजेश और पप्पू की एक नई तिकड़ी बन गई है।
भूमिहारों की नाराजगी और कांग्रेस की नई रणनीति
अखिलेश सिंह को हटाए जाने के बाद कांग्रेस से भूमिहार समाज नाराज बताया जा रहा है। हालांकि, इसका कारण यह नहीं है कि अखिलेश कोई बड़े भूमिहार नेता थे, बल्कि समुदाय को लगता है कि कांग्रेस ने उनके समाज की उपेक्षा की है। अब कांग्रेस इस नाराजगी को कम करने के लिए कन्हैया कुमार को आगे कर सकती है, क्योंकि वे कम्युनिस्ट पृष्ठभूमि के बावजूद भूमिहार समुदाय से आते हैं।
कन्हैया कुमार का फोकस युवाओं को कांग्रेस से जोड़ने पर रहेगा, जबकि राजेश कुमार का लक्ष्य दलित वोट बैंक को जीतन राम मांझी और चिराग पासवान से छीनकर कांग्रेस के पक्ष में करना होगा। इस बैठक में इन्हीं रणनीतियों को अंतिम रूप दिया गया। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस का नया नेतृत्व इन चुनौतियों से कैसे निपटता है और अपने राजनीतिक समीकरण को कैसे मजबूत करता है।