Bihar Chunav: एक तरफ सियासत का सुपर संडे, आरा और मुजफ्फरपुर से दिल्ली को बड़ा मैसेज?
सिटी पोस्ट लाइव : लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा एनडीए की मुश्किल बढ़ा रहे हैं। चिराग पासवान ने आरा और उपेंद्र कुशवाहा ने मुजफ्फरपुर में रैली कर बीजेपी को तगड़ा संदेश दिया है। दोनों नेता रैलियों के माध्यम से दिल्ली तक स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि उन्हें कमजोर न समझा जाए. सारी तैयारी एनडीए में टिकट बंटवारे को लेकर हो रही है.चिराग का बिहार फर्स्ट का नारा और कुशवाहा का जातीय समीकरण, दोनों ही बिहार की सियासत को नई दिशा दे सकते हैं. यह रैलियां न केवल बिहार के मतदाताओं के लिए, बल्कि दिल्ली में बैठे एनडीए के रणनीतिकारों के लिए भी एक बड़ा संदेश हैं.
चिराग और कुशवाहा, दोनों ही अपनी-अपनी रणनीतियों के साथ बिहार की सियासत में अपनी स्थिति मजबूत करने और एनडीए में अधिक से अधिक हिस्सेदारी हासिल करने की कोशिश में लगे हैं.. चिराग के सामान्य सीट से विधानसभा चुनाव लड़ने के एलजेपी (रामविलस ) के फैसले बड़े राजनीतिक मायने रखते हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में चिराग की पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई लेकिन जेडीयू का खेल बिगाड़ दिया था। इस बार चिराग न केवल अपनी पार्टी को पुनर्जन्म देना चाहते हैं, बल्कि “बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट” के नारे के साथ युवाओं और विभिन्न जातीय समूहों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं.
चिराग का सामान्य सीट से चुनाव लड़ने का फैसला यह संदेश देता है कि वे केवल पासवान समुदाय के नेता नहीं, बल्कि पूरे बिहार के प्रतिनिधि बनना चाहते हैं. उनके जीजा और जमुई सांसद अरुण भारती ने इस रणनीति को रेखांकित करते हुए कहा कि चिराग का यह कदम उनकी व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है. एनडीए के भीतर चिराग की मांग 50 सीटों की है। रविवार को उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि इतनी सीटें नहीं मिली तो वो एनडीए छोड़ सकते हैं। सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर उन्होंने एनडीए की नींद उदय दी है।
कुशवाहा अपनी सियासी रणनीति, अपनी नाराजगी और महत्वाकांक्षा का संकेत दे दिया है। उनकी मांग भी 20-25 सीटों की है। उनकी रैली का उद्देश्य बीजेपी को यह संदेश देना है कि वे गठबंधन में एक महत्वपूर्ण साझेदार हैं और उनकी अनदेखी महंगी पड़ सकती है. चिराग और कुशवाहा, दोनों ही एनडीए के भीतर अपनी-अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश में हैं. बीजेपी और जेडीयू के सामने अब चुनौती है कि वे इन दोनों नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को कैसे संतुलित करें. चिराग की युवा अपील और कुशवाहा का जातीय समीकरण, दोनों ही बिहार की सियासत में महत्वपूर्ण हैं. अगर एनडीए इन दोनों को संतुष्ट नहीं कर पाया, तो इसका फायदा विपक्षी महागठबंधन, खासकर तेजस्वी यादव की आरजेडी को मिल सकता है.