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बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नया राजनीतिक शब्द तेजी से वायरल हो रहा है — “जमाई आयोग”। इस शब्द को हवा दी है नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने, जिन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार में अपनों को उपकृत करने की होड़ मची है। तेजस्वी ने कटाक्ष करते हुए कहा कि “भूंजा पार्टी” चल रही है और “मलाई-रेवड़ी” आपस में बांटी जा रही है।
तेजस्वी ने कहा कि मुख्यमंत्री की शाम की बैठकों में जो भूंजा पार्टी वाले होते हैं, उन्हें वरदान मिल गया है। नीतीश कुमार अचेत अवस्था में हैं और उनके करीबी सत्ता का सुख भोग रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि:
• रामविलास पासवान के दामाद को आयोग में जगह मिली,
• जीतनराम मांझी के दामाद को भी पद मिला,
• अशोक चौधरी (जदयू मंत्री) के दामाद सायन कुणाल को धार्मिक न्याय परिषद का सदस्य बनाया गया
• और जदयू नेता संजय झा की दोनों बेटियों को सुप्रीम कोर्ट में Advocate on Record बना दिया गया — जबकि तेजस्वी का दावा है कि उनके पास कोई अनुभव नहीं है।
तेजस्वी ने इस पूरी प्रक्रिया को “दामादों की भर्ती योजना” करार देते हुए इसे योग्यता की जगह सिफारिश का नतीजा बताया।
जदयू का पलटवार
इन आरोपों पर जदयू की ओर से मंत्री अशोक चौधरी ने जवाब दिया और कहा कि: उनके दामाद सायन कुणाल को आचार्य किशोर कुणाल (पूर्व IPS, समाजसेवी) के पुत्र होने के नाते RSS कोटे से बिहार राज्य धार्मिक न्याय परिषद में शामिल किया गया है।
अशोक चौधरी ने तेजस्वी पर तंज कसते हुए कहा कि “जिनके परिवार के खुद 7 सदस्य सत्ता में पदों पर रहे हैं, वे अब ‘दामाद आयोग’ की बात कर रहे हैं। जनता उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेती।” “जमाई आयोग” को लेकर शुरू हुई यह राजनीतिक बहस अब भाई-भतीजावाद, पारिवारिक नियुक्ति और योग्यता बनाम सिफारिश की बड़ी लड़ाई में बदलती दिख रही है। एक ओर तेजस्वी इसे शासन की नाकामी और भ्रष्टाचार बता रहे हैं, वहीं जदयू इसे योग्य लोगों को जिम्मेदारी सौंपने का सही निर्णय बता रही है।