चिराग पासवान की बढ़ती डिमांड: बिहार चुनाव से पहले NDA में सीट शेयरिंग पर ‘खींचतान’

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर सीट-बंटवारे को लेकर चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। इस बार सबसे बड़ी चुनौती केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान को मनाना है। पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के शानदार प्रदर्शन के बाद चिराग पासवान इस बार विधानसभा चुनाव में अधिक सीटों की मांग कर रहे हैं, जिससे सहयोगी दलों में बेचैनी है।

चिराग पासवान की बढ़ती बारगेनिंग पावर
लोकसभा चुनाव 2024 में चिराग पासवान की पार्टी ने पांच सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी पर जीत हासिल की। पार्टी को बिहार में 6% से अधिक वोट मिले। इस शानदार प्रदर्शन के बाद, चिराग पासवान अब विधानसभा चुनाव में एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरे हैं। वे NDA के भीतर अपनी स्थिति को और मज़बूत करने के लिए भाजपा और जदयू पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी क्रम में, उन्होंने सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार पर कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं। इस “दोस्ताना हमला” से जदयू और जीतन राम मांझी की हम (HAM) जैसी पार्टियां असहज महसूस कर रही हैं।

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भाजपा को चिराग पासवान की ज़रूरत क्यों?
चिराग पासवान स्वर्गीय राम विलास पासवान के बेटे हैं और उनकी पार्टी लोजपा (रामविलास) को पासवान समुदाय का बड़ा समर्थन हासिल है। पासवान बिहार की जनसंख्या का 6% हिस्सा हैं और एक महत्वपूर्ण दलित समुदाय हैं। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में, जब लोजपा अविभाजित थी, तो उसने अकेले चुनाव लड़ा था। तब पार्टी ने सिर्फ़ एक सीट जीती थी, लेकिन नौ सीटों पर दूसरे स्थान पर रहकर NDA को भारी नुकसान पहुंचाया था। भाजपा जानती है कि चिराग पासवान इस बार और भी बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं, और वे लगातार संकेत दे रहे हैं कि अगर उनकी सीट-बंटवारे की मांग पूरी नहीं हुई, तो वे अकेले भी चुनाव लड़ सकते हैं।

सीटों की मांग और भाजपा का प्रस्ताव
सूत्रों के अनुसार, चिराग पासवान ने अपनी पार्टी के लिए 40 विधानसभा सीटों की मांग की है, जबकि भाजपा उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा 25 सीटें देने का प्रस्ताव दे रही है। केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री के रूप में, चिराग पासवान भविष्य में केंद्र में एक बड़ी भूमिका की तलाश में हैं, ताकि उनकी पार्टी को अधिक पहचान मिल सके।

भाजपा के लिए यह भी चिंता का विषय है कि अगर वे चिराग पासवान को बहुत ज़्यादा सीटें देते हैं, तो इससे उनके अन्य सहयोगी, विशेष रूप से जदयू, नाराज़ हो सकते हैं। चिराग पासवान और नीतीश कुमार के बीच पहले से ही तनातनी रही है, और भाजपा, जो केंद्र में जदयू के समर्थन पर निर्भर है, नीतीश कुमार को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकती।

चिराग पासवान खुद को भविष्य में मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में भी स्थापित कर रहे हैं। ‘बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट’ जैसे अभियानों और ‘चिराग का चौपाल’ जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से, वह यह संदेश दे रहे हैं कि वह सिर्फ एनडीए के सदस्य नहीं, बल्कि एक मज़बूत राजनीतिक शक्ति हैं। अब भाजपा के सामने चिराग पासवान की महत्वाकांक्षाओं को साधने और जदयू तथा अन्य सहयोगियों को भी साथ लेकर चलने की कठिन चुनौती है।

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