बिहार विधानसभा चुनाव 2025: इन सीटों पर भूमिहार बनाम भूमिहार की ‘रणनीतिक जंग’, किसके हाथ लगेगी सत्ता की चाबी?

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, चुनावी मैदान में जातीय समीकरण और भी रोचक होते जा रहे हैं। इस बार खासकर अगड़ी जातियों में शामिल भूमिहार समुदाय की राजनीतिक स्थिति सुर्खियों में है। परंपरागत तौर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ खड़ा रहने वाला यह समुदाय अब बनी-बनाई राजनीतिक रेखाओं को तोड़ता नजर आ रहा है, जिसने प्रदेश की सियासत का तापमान बढ़ा दिया है।

भूमिहार बनाम भूमिहार: कई सीटों पर सीधी टक्कर
बिहार की राजनीति में भूमिहार वोटरों की भूमिका हमेशा से ही अहम रही है। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में लगभग 51% भूमिहारों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को और करीब 19% ने महागठबंधन को वोट दिया था, लेकिन इस बार सियासी समीकरण बदलते दिख रहे हैं। कई सीटों पर एक ही समुदाय के उम्मीदवार आमने-सामने हैं, जिससे यह वोट बैंक बंटता नजर आ रहा है।

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बीजेपी ने इस चुनाव में लगभग 32 भूमिहार उम्मीदवारों को टिकट देकर अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने की कोशिश की है, जबकि महागठबंधन (RJD-कांग्रेस) ने भी करीब 15 भूमिहार प्रत्याशी मैदान में उतारकर बड़ा दांव खेला है। मोकामा, केसुआ, बरबीघा, बेगूसराय, मटिहानी, बिक्रम, और लखीसराय जैसी सीटों पर भूमिहार बनाम भूमिहार की सीधी टक्कर से चुनावी हवा का रुख बदलने की संभावना है।

बिक्रम सीट का रोचक मुकाबला
राजधानी पटना के पास की बिक्रम विधानसभा सीट पर मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। यहां बीजेपी प्रत्याशी सिद्धार्थ सौरभ और कांग्रेस उम्मीदवार अनिल कुमार के बीच सीधा मुकाबला है, और संयोग से दोनों ही भूमिहार जाति से आते हैं।

सिद्धार्थ सौरभ: पहले कांग्रेस में थे, दल बदलकर बीजेपी में आए। विकास और सुशासन के नाम पर वोट मांग रहे हैं।

अनिल कुमार: तीन बार के विधायक रह चुके हैं। 2020 में निर्दलीय लड़कर 52,000 वोट हासिल किए थे। बीजेपी से टिकट न मिलने पर कांग्रेस में शामिल हुए। उनका स्थानीय आधार काफी मजबूत माना जाता है।

बीजेपी और एनडीए उम्मीदवार अपने प्रचार में प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में हुए विकास को मुख्य मुद्दा बना रहे हैं। बीजेपी का जोर इस बात पर है कि मतदाता जाति नहीं, बल्कि विकास के नाम पर मतदान करें।

महागठबंधन की भूमिहारों को लुभाने की रणनीति
दूसरी ओर, महागठबंधन इस बार पूरी ताकत से भूमिहार वोटरों को लुभाने की कोशिश कर रहा है। राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के नेता अखिलेश प्रसाद सिंह का दावा है कि इस चुनाव में महागठबंधन भूमिहार बहुल सीटों पर मजबूत स्थिति में है। उनके मुताबिक, इस बार तेजस्वी यादव ने भी कई भूमिहार उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जिससे समुदाय में महागठबंधन के प्रति रुझान बढ़ा है।

निर्णायक भूमिका में भूमिहार
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भले ही भूमिहारों की जनसंख्या बिहार में लगभग 2.9% है, लेकिन इनका प्रभाव ज़मीन से जुड़ा है। बिक्रम, पाली, बेगूसराय, जहानाबाद, मोकामा, और नवादा जैसे इलाकों में यह समुदाय निर्णायक भूमिका निभाता है। इसी कारण हर दल का फोकस इन चुनावों में इन्हीं वोटरों पर है।

स्थानीय मतदाताओं का कहना है कि हर बार भूमिहार वोट बीजेपी के साथ जाता रहा है, लेकिन महागठबंधन की सक्रियता से इस बार स्थितियाँ बदल सकती हैं। सियासी शतरंज की इस बिसात पर भूमिहारों की चाल किसके हक़ में जाएगी – बीजेपी या महागठबंधन? यह चुनावी नतीजे ही बताएंगे, लेकिन इतना तय है कि बिहार की सत्ता की चाबी एक बार फिर इस प्रभावशाली समुदाय के हाथ में है।

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