लखीसराय विधानसभा: क्या बीजेपी का ‘विजय रथ’ रुकेगा? जानिए विजय सिन्हा की सीट का चुनावी इतिहास और समीकरण!

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार विधानसभा चुनाव के रण में हर सीट का अपना एक अलग इतिहास और समीकरण होता है। लखीसराय विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दबदबा दशकों से कायम रहा है, और यह सीट अब पूर्व उपमुख्यमंत्री और कद्दावर नेता विजय कुमार सिन्हा के नाम से पहचानी जाती है। 1977 में अस्तित्व में आने के बाद से, पिछले 48 वर्षों के चुनावी इतिहास में, इस सीट से सर्वाधिक पाँच बार बीजेपी के प्रत्याशी ने जीत हासिल की है।

बीजेपी का गढ़ रहा है लखीसराय
लखीसराय विधानसभा सीट पर बीजेपी की जीत का सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा है। 1977 से लेकर अब तक के चुनावों में, बीजेपी के अलावा जनता दल और जनता पार्टी ने दो-दो बार, जबकि कांग्रेस और राजद (राष्ट्रीय जनता दल) ने एक-एक बार जीत दर्ज की है।

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लखीसराय विधानसभा में अब तक की जीत का लेखा-जोखा:

विजय सिन्हा का वर्चस्व
लखीसराय सीट पर बीजेपी के दबदबे को मजबूत करने में सबसे बड़ी भूमिका विजय कुमार सिन्हा की रही है। उन्होंने इस सीट पर लगातार तीन बार जीत हासिल कर बीजेपी का किला मज़बूत किया है।

वर्ष 2000: बीजेपी के कृष्ण चंद्र प्रसाद सिंह ने राजद के फुलैना सिंह को 12,180 मतों के अंतर से हराकर पहली बार बीजेपी के लिए सीट जीती।

वर्ष 2005 (फरवरी): विजय कुमार सिन्हा ने पहली बार जीत हासिल की, लेकिन सरकार गठन न होने के कारण यह कार्यकाल अल्पकालिक रहा।

वर्ष 2005 (अक्टूबर): यह एकमात्र मौका था जब विजय सिन्हा को राजद के फुलैना सिंह से हार का सामना करना पड़ा। फुलैना सिंह ने उन्हें मात्र 80 वोटों के बेहद कम अंतर से हराया, जो इस सीट के इतिहास का सबसे करीबी मुकाबला था।

वर्ष 2010: विजय कुमार सिन्हा ने दमदार वापसी की। उन्होंने राजद के फुलैना सिंह को 59,620 मतों के भारी अंतर से हराकर अपनी सबसे बड़ी जीत दर्ज की।

वर्ष 2015: विजय सिन्हा ने फिर से बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल की। इस बार उन्होंने जनता दल यूनाइटेड (JDU) के रामानंद मंडल को 6,556 वोटों से हराया।

वर्ष 2020: उन्होंने कांग्रेस के अमरेश कुमार अनीश को 10,483 मतों के अंतर से पराजित कर जीत की हैट्रिक लगाई और लगातार तीसरी बार लखीसराय का प्रतिनिधित्व किया।

इस बार क्या कहते हैं समीकरण?
विजय कुमार सिन्हा वर्तमान में बिहार बीजेपी के सबसे मुखर नेताओं में से एक हैं और विधानसभा अध्यक्ष (पूर्व) एवं उप-मुख्यमंत्री (पूर्व) जैसे बड़े पदों पर रह चुके हैं। उनका मजबूत स्थानीय आधार और बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक उनकी ताकत है। हालांकि, भूमिहार बनाम भूमिहार की संभावित लड़ाई और महागठबंधन की ओर से संभावित चुनौती इस बार के मुकाबले को रोचक बना सकती है।

लखीसराय के मतदाता विकास और स्थानीय नेतृत्व को कितना महत्व देते हैं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या विजय सिन्हा अपना ‘विजय रथ’ जारी रख पाएंगे या महागठबंधन इस बार बीजेपी के गढ़ में सेंध लगाने में सफल होगा। सियासी गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि बीजेपी का दबदबा इस बार भी कायम रहेगा, लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच और जातीय गोलबंदी अंतिम नतीजे को प्रभावित कर सकती है।

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