महाराष्ट्र की राजनीति के ‘अजित’ अध्याय का अंत: विमान हादसे में डिप्टी सीएम अजित पवार का निधन, शोक में डूबा देश

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
महाराष्ट्र की राजनीति का वो विशाल वटवृक्ष, जिसकी छाया में सत्ता के न जाने कितने समीकरण बने और बिगड़े, आज हमेशा के लिए खामोश हो गया। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और कद्दावर नेता अजित पवार का बुधवार सुबह एक भीषण विमान हादसे में दुखद निधन हो गया। बारामती की माटी के लाडले ‘अजित दादा’ के इस आकस्मिक प्रस्थान ने न केवल उनके परिवार को, बल्कि समूचे भारतीय लोकतंत्र को एक ऐसी चोट दी है, जिसकी भरपाई नामुमकिन है।

हादसे की भयावहता: लैंडिंग से चंद मिनट पहले मलबे में तब्दील हुआ विमान
यह दर्दनाक हादसा पुणे जिले के बारामती एयरपोर्ट पर सुबह करीब पौने नौ बजे हुआ। प्राप्त जानकारी के अनुसार, अजित पवार अपने निजी विमान ‘लियरजेट-45’ से सफर कर रहे थे। विमान जब रनवे पर लैंडिंग की तैयारी कर रहा था, तभी तकनीकी खराबी के कारण संतुलन बिगड़ गया और वह क्रैश हो गया। इस हादसे की तीव्रता इतनी अधिक थी कि विमान के परखच्चे उड़ गए। हादसे में अजित पवार के साथ उनके पांच सहयोगियों की भी जान चली गई, जिससे पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है।

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देशभर के नेताओं ने जताया ‘वज्रपात’ पर शोक
जैसे ही यह खबर फैली, सत्ता गलियारों से लेकर आम जनमानस तक सन्नाटा पसर गया। बिहार और दिल्ली के प्रमुख नेताओं ने इसे व्यक्तिगत क्षति बताया है:

लालू प्रसाद यादव (राजद सुप्रीमो): उन्होंने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए इस घटना को अत्यंत दुखद बताया और हादसे की उच्च स्तरीय जांच की मांग की।

तेजस्वी यादव: नेता प्रतिपक्ष ने स्तब्धता जाहिर करते हुए कहा कि “अजित पवार का व्यक्तित्व विराट था, उनके जाने से राजनीति का एक युग समाप्त हो गया।”

शाहनवाज हुसैन: पूर्व केंद्रीय मंत्री ने इसे अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने निजी एयरलाइन कंपनियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा, “हाल ही में शरद पवार जी के घर और नीतीश जी के शपथ ग्रहण में उनसे लंबी बात हुई थी। उनका जाना एक गहरा व्यक्तिगत घाव है।”

चिराग पासवान और जीतनराम मांझी: दोनों ने इसे ‘हृदयविदारक’ बताते हुए शोकाकुल समर्थकों के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट कीं।

एक युग का अंत: अधूरा रह गया सीएम बनने का सपना
अजित पवार केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के ‘दादा’ थे। बारामती की गलियों से शुरू हुआ उनका सफर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा। हालांकि, उनके मन में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक न पहुंच पाने की एक टीस हमेशा रही, लेकिन शासन और प्रशासन पर उनकी जैसी पकड़ थी, वैसी मिसाल कम ही मिलती है। वे विकास के प्रणेता थे और ज़मीनी स्तर पर काम करने के लिए जाने जाते थे।

आज बारामती की सड़कें सूनी हैं और महाराष्ट्र का सियासी आसमान धुंधला गया है। एक ऐसा नेता जो कभी हारना नहीं जानता था, आज नियति के क्रूर फैसले के आगे हार गया।

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