बिहार में शराबबंदी का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। नीतीश कुमार सरकार ने 2016 में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था, और अब लगभग 10 साल पूरे होने वाले हैं। बजट सत्र में विपक्ष (विशेषकर RJD, कांग्रेस और अन्य) ने सरकार पर हमला बोला है, जबकि सत्ता पक्ष इसे अपनी उपलब्धि बताता रहा है। लेकिन हाल के घटनाक्रम में कांग्रेस के चनपटिया विधायक अभिषेक रंजन ने सबसे अनोखी और विवादास्पद मांग रखी है।
अभिषेक रंजन की मांग:
अभिषेक रंजन ने कहा है कि शराबबंदी की सच्चाई जानने के लिए विधानसभा के सभी विधायकों, सरकारी कर्मचारियों, पुलिस अधिकारियों और न्यायपालिका से जुड़े लोगों का ब्लड टेस्ट कराया जाए। उनका तर्क है कि इससे पता चल जाएगा कि कानून कितना प्रभावी है और कौन-कौन लोग अभी भी शराब पी रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि बिहार में शराब की होम डिलिवरी होती है, और जरूरत पड़ने पर विधानसभा में भी पहुंच सकती है। दरअसल, यह बयान विधानसभा के बाहर मीडिया से दिया गया, जिससे सियासी बवाल मच गया। सत्ता पक्ष (जैसे मंत्री लखींद्र पासवान) ने पलटवार किया कि अगर टेस्ट होना है तो पहले नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का हो। तेजस्वी पर सदन में शराब के नशे में होने के आरोप लगे थे, जिस पर अभिषेक ने कहा कि उनके पैर की उंगली में चोट लगी है, और सत्ता पक्ष “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली राजनीति कर रहा है। हालांकि, यह मांग प्रतीकात्मक है, लेकिन इससे शराबबंदी की जमीनी हकीकत पर बहस तेज हो गई है।
शराबबंदी के बाद ड्रग्स का बढ़ता खतरा;
शराबबंदी के बाद बिहार में अवैध शराब (हूच) के साथ-साथ ड्रग्स (नशीले पदार्थ जैसे गांजा, अफीम, कोकीन आदि) का सेवन और तस्करी काफी बढ़ गई है। रिपोर्ट्स के अनुसार- 2016 के बाद ड्रग्स से जुड़े मामलों में चार गुना से ज्यादा वृद्धि हुई है। युवा वर्ग विशेष रूप से प्रभावित है, और ड्रग रैकेट सक्रिय हो गए हैं।सरकार ने ड्रग्स जब्ती के आंकड़े पेश किए हैं (जैसे हजारों किलो गांजा, अफीम आदि), लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह समस्या बढ़ रही है और शराबबंदी ने नशे का रूप बदल दिया है।
राजस्व का बड़ा घाटा;
शराबबंदी का एक प्रमुख पक्ष आर्थिक नुकसान है। पहले (2015-16 में) excise से राज्य को लगभग 3,000-6,000 करोड़ रुपये की आय होती थी, जो अब नगण्य है। विभिन्न अनुमानों के अनुसार- सालाना 15,000 से 28,000 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हो रहा है। यह पैसा स्कूल, अस्पताल, सड़क आदि पर खर्च हो सकता था। पड़ोसी राज्यों में excise राजस्व बढ़ा है, जबकि बिहार में ब्लैक मार्केट फल-फूल रहा है।
नीतीश कुमार ने शराबबंदी महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा कम करने और सामाजिक सुधार के लिए लगाई थी, और कुछ हद तक घरेलू हिंसा में कमी आई है। लेकिन विपक्ष (तेजस्वी यादव समेत) कहता है कि कानून फेल हो चुका है, भ्रष्टाचार बढ़ा है, और गरीब-दलितों को ज्यादा सताया जा रहा है। कुल मिलाकर, शराबबंदी अब चुनावी मुद्दा बन चुकी है। विपक्ष समीक्षा या संशोधन की मांग कर रहा है, जबकि सरकार इसे बनाए रखने पर अड़ी है। अभिषेक रंजन का ब्लड टेस्ट वाला बयान इस बहस को नया मोड़ दे रहा है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसे लागू करना मुश्किल लगता है।