सिटी पोस्ट लाइव
बिहार की सियासत में इन दिनों एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की सक्रिय राजनीति में औपचारिक एंट्री होने वाली है? राज्यसभा चुनाव के नामांकन की अंतिम तिथि 5 मार्च जैसे-जैसे करीब आ रही है, पटना के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि जेडीयू कोटे से निशांत कुमार को उच्च सदन भेजा जा सकता है।
सिद्धांतों की सबसे बड़ी परीक्षा
नीतीश कुमार की पूरी राजनीति ‘परिवारवाद’ के कड़े विरोध पर टिकी रही है। उन्होंने दशकों तक अपने परिवार को सत्ता और संगठन से दूर रखकर खुद को लालू प्रसाद यादव के ‘वंशवाद’ मॉडल के विकल्प के रूप में पेश किया। ऐसे में अगर निशांत कुमार राज्यसभा जाते हैं, तो यह नीतीश कुमार की अपनी ही खींची गई उस लकीर को पार करने जैसा होगा, जिसे उन्होंने पिछले 19 सालों में बेहद मजबूती से बनाए रखा है।
एग्जिट प्लान या उत्तराधिकार की तैयारी?
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग इसे नीतीश कुमार के ‘एग्जिट प्लान’ के तौर पर देख रहा है। चर्चा है कि नीतीश कुमार अब अपनी विरासत को सुरक्षित हाथों में सौंपने की स्क्रिप्ट तैयार कर रहे हैं। राज्यसभा एक सुरक्षित मंच है, जहाँ बिना सीधे चुनावी दंगल में उतरे राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव प्राप्त किया जा सकता है। जेडीयू के भीतर भी लंबे समय से एक शिक्षित और युवा चेहरे को नेतृत्व की कतार में लाने की मांग उठती रही है।
विपक्ष का रुख: तंज और समर्थन के बीच
निशांत की संभावित एंट्री पर विपक्ष की प्रतिक्रिया भी दिलचस्प है:
आरजेडी: राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने चुटकी लेते हुए कहा कि लालू परिवार ने तो हमेशा निशांत के राजनीति में आने का समर्थन किया है, अब देखना है कि नीतीश कुमार उन्हें कब तक रोकते हैं।
कांग्रेस: कांग्रेस ने निशांत की जमीनी समझ पर सवाल उठाए हैं, हालांकि इसे जेडीयू का आंतरिक मामला बताया है।
बीजेपी: वहीं, बीजेपी प्रवक्ता प्रभाकर मिश्रा ने इसे ‘सकारात्मक पहल’ बताते हुए कहा कि शिक्षित युवाओं का राजनीति में आना लोकतंत्र के लिए अच्छा है।
राज्यसभा का समीकरण
बिहार की 5 सीटों के चुनाव में एनडीए की 4 सीटें (2 भाजपा, 2 जेडीयू) सुरक्षित हैं। जेडीयू की दूसरी सीट के लिए निशांत कुमार का नाम सबसे ऊपर है। हालांकि, पार्टी ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है। 4 मार्च को होली होने के कारण माना जा रहा है कि 5 मार्च को नामांकन के आखिरी दिन ही नीतीश कुमार अपने पत्तों से पर्दा उठाएंगे।
क्या ‘मिस्टर क्लीन’ अपनी साख और सिद्धांतों से समझौता करेंगे, या फिर कोई नया चेहरा सामने लाकर सबको चौंका देंगे? 5 मार्च का दिन बिहार की राजनीति की दिशा तय करेगा।