IPS अपर्णा कौशिक की बॉडी शेमिंग पर मचा बवाल: क्या आप जानते हैं किसी के शरीर का मजाक उड़ाने पर कितनी जेल हो सकती है?…

Ritu Raj

मिर्जापुर की एसपी (SP) अपर्णा कौशिक के साथ हुई हालिया घटना ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है: क्या सोशल मीडिया पर किसी की गरिमा सुरक्षित है? एक महिला आईपीएस अधिकारी, जो कानून व्यवस्था पर बयान दे रही थीं, उन्हें उनकी कार्यक्षमता के बजाय उनकी शारीरिक बनावट (Body Shaming) के आधार पर निशाना बनाया गया। यह घटना दर्शाती है कि डिजिटल दुनिया में लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी और अभद्रता के बीच का अंतर भूलते जा रहे हैं। आइए इस पूरे मामले को कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण से समझते हैं।

बॉडी शेमिंग: केवल मजाक नहीं, एक मानसिक प्रहार
बॉडी शेमिंग केवल मजाक नहीं बल्कि एक गहरा मानसिक प्रहार है, जिसमें किसी व्यक्ति के रंग, रूप, वजन या शारीरिक बनावट का सार्वजनिक रूप से उपहास उड़ाया जाता है; अपर्णा कौशिक के मामले में आपत्तिजनक टिप्पणियाँ इतनी बढ़ गईं कि पुलिस को वीडियो का कमेंट सेक्शन बंद करना पड़ा। इसका मानसिक प्रभाव बेहद गंभीर होता है, जो पीड़ित को अवसाद (Depression), सामाजिक अलगाव और कम आत्मसम्मान की ओर धकेल सकता है। वहीं, जब कोई लोक सेवक ड्यूटी पर हो, तो इस तरह की टिप्पणियाँ न केवल उसके व्यक्तिगत सम्मान को ठेस पहुँचाती हैं, बल्कि उसकी वर्दी और पद की गरिमा पर भी सीधा आघात करती हैं।

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क्या कहता है कानून?

धारा / एक्टविवरणसजा का प्रावधान
BNS धारा 356मानहानि (Defamation) – किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना.2 साल तक की जेल या जुर्माना.
BNS धारा 79महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले शब्द, हाव-भाव या कृत्य.3 साल तक की जेल और जुर्माना.
IT एक्ट (धारा 67)डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अश्लील या अपमानजनक सामग्री साझा करना.3 से 5 साल की जेल और भारी जुर्माना.

अधिकार और जागरूकता;
संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है, और मिर्जापुर की इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि डिजिटल फुटप्रिंट स्थायी होते हैं, जहाँ सोशल मीडिया पर किया गया एक अभद्र कमेंट भी किसी व्यक्ति को जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा सकता है। साथ ही, महिला सुरक्षा सर्वोपरि है और महिलाओं, विशेषकर कार्यस्थल पर तैनात अधिकारियों के खिलाफ इस प्रकार की टिप्पणी करना संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। निष्कर्षतः, सोशल मीडिया की भीड़ में बैठकर किसी की बनावट पर टिप्पणी करना साहस नहीं, बल्कि मानसिक संकीर्णता और अपराध है, और ऐसे मामलों में कानून अब पहले से कहीं अधिक सख्त हो चुका है।

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