अंग्रेजों ने 1931 में पहली बार कराई थी जातिगत जनगणना, जानिए भारत में कास्ट सर्वे का क्या रहा है इतिहास
सिटी पोस्ट लाइव : आजाद भारत के इतिहास में पहलीबार जातीय जनगणना होगी. साल 2011 में यूपीए सरकार ने पूरे देश में कास्ट सेंसस के लिए कदम उठाया था. सोशियो इकनॉमिक कास्ट सेंसस (SECC) कराया गया, लेकिन उसके आंकड़े जारी नहीं हुए. मोदी सरकार अब जनगणना में जातियों की गिनती करने जा रही है. किस जाति के कितने लोग देश में हैं, यह जानकारी आजाद भारत में पहली बार सामने आएगी .आजादी से पहले 1931 में जातीय जनगणना अंग्रेजों ने करवाई थी. इस जातीय जनगणना से सामाजिक और आर्थिक रूप से अहम जानकारी सामने आएगी. सरकार को भी कल्याणकारी नीतियों का फायदा वंचित वर्गों तक सटीक तरीके से पहुंचाने में आसानी होगी.
यूपीए सरकार ने 2011 में सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना (SECC) कराई, जो आजाद भारत में राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह का पहला कदम था.2014 मई में यूपीए सरकार की विदाई हो गई. मोदी सरकार ने जून 2014 में लोकसभा को बताया था कि SECC का काम पूरा होने में और 3 महीने लगेंगे. हालांकि उसके आंकड़े कभी जारी नहीं हो सके. 2018 में सरकार ने लोकसभा को बताया कि ‘कास्ट डेटा की प्रोसेसिंग में कुछ गलतियों का पता चला है.’ 2021 में मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दिया और कहा कि एससी, एसटी के सिवा बाकी लोगों के बीच कास्ट सेंसस ‘कराना प्रशासनिक रूप से बेहद मुश्किल और जटिल है.’
संविधान के अनुच्छेद 246 के अनुसार जनगणना का मामला केंद्र सरकार का है, लेकिन कर्नाटक, बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों ने इस दिशा में कदम उठाए. चूंकि संवैधानिक रूप से ये जातिगत जनगणना नहीं करा सकते थे, लिहाजा इन्होंने इसे कास्ट सर्वे का नाम दिया.कर्नाटक में सिद्धरमैया सरकार ने 2015 में कास्ट सर्वे कराया था, लेकिन उसका नतीजा सामने नहीं आ सका. बिहार में JDU-RJD सरकार ने 2023 में जातिगत सर्वे कराया और इसके नतीजे भी जारी किए. तेलंगाना में भी कांग्रेस सरकार ने 2023 में सामाजिक, आर्थिक एवं जातिगत सर्वे कराया और नतीजे जारी कि.