सिटी पोस्ट लाइव : तेजस्वी यादव को अपने माता-पिता से विरासत में क्या मिला? एक मजबूत बना बनाया राजनीतिक दल और दूसरा जंगल राज का तगमा.तेजस्वी यादव लालू यादव की राजनीतिक विरासत को बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं लेकिन जंगल राज का भार उन्हें सत्ता पर काबिज नहीं होने दे रहा. लालू यादव का ‘जंगलराज’वाला इमेज तेजस्वी यादव का पीछा नहीं छोड़ रहा.इसी जगल राज को हथियार बनाकर नीतीश कुमार सुशासन के वादे के साथ सत्ता में आये और आज भी सत्ता में बने रहने के लिए लालू यादव के उसी जंगल राज का डर दिखाकर सत्ता पर काबिज होने में जुटे हैं.
1990 में जब लालू यादव पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, तब उनकी पहचान सामाजिक न्याय के एक योद्धा की बनी. पिछड़े वर्गों को सत्ता में हिस्सेदारी दिलाना, उनका मान-सम्मान बढ़ाना उनका मिशन था. लेकिन जल्द ही उनके शासन पर भ्रष्टाचार, जातिवाद और बिगड़ती कानून-व्यवस्था के आरोप लगने लगे. 1995-2005 के दशक में बिहार में अपराध, अपहरण, रंगदारी और माफिया राजनीति का बोलबाला हो गया.
इस बीच पटना उच्च न्यायालय 5 अगस्त 1997 को एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था. उस वक्त न्यायमूर्ति जस्टिस वीपी आनंद और जस्टिस धर्मपाल सिन्हा की बेंच के सामने सामाजिक कार्यकर्ता कृष्णा सहाय की याचिका पेश हुई थी, जिसमें उन्होंने बिहार के हालात का जिक्र किया था. उस वक्त पटना उच्च न्यायालय ने कहा था, ‘बिहार में सरकार नहीं है. यहां भ्रष्ट अफसर राज्य चला रहे हैं और बिहार में जंगलराज कायम हो गया है.’ दरअसल, बिहार के लिए पहली बार जंगलराज शब्द का इस्तेमाल पटना उच्च न्यायालय ने किया था, जिसके बाद यह शब्द आम हो गया और लालू-राबड़ी राज के लिए राजनीतिक चलन में आ गया
2005 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने इसी शब्द को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया और कहा, “अब बिहार को जंगलराज से निकालकर सुशासन देना है.” इस नैरेटिव का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि लालू यादव की छवि एक ‘जननेता’ से बदलकर ‘अराजक प्रशासक’ के रूप में बनने लगी और 2005 में आरजेडी को बिहार के लोगों ने सत्ता से बाहर कर दिया और नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ मॉडल को हाथों-हाथ लिया.
आरजेडी बिहार की सत्ता से करीब दो दशक से बाहर है. पार्टी में लालू-राबड़ी का दौर खत्म हो चुका है. पार्टी की कमान अब तेजस्वी के हाथों में हैं. इसके बावजूद सत्ता पक्ष उन्हें लगातार याद दिलाता है कि “तुम उसी जंगलराज की पैदाइश हो.” वहीं, जनता की याददाश्त में ‘जंगलराज’ एक डरावनी छवि बरकरार है. अपराधियों के खुलेआम घूमने की, सरकारी ढांचे के ध्वस्त हो जाने की, और आम लोगों के असुरक्षित महसूस करने की. ऐसे में आज भी जब बिहार में चुनाव आता है, तो यह शब्द वापसी करता है और लालू यादव की विरासत को कटघरे में खड़ा कर देता है. ‘जंगलराज’ ने लालू यादव की छवि पर ऐसा दाग लगाया जो अब उनके बेटे की राजनीति तक पीछा नहीं छोड़ता.
तेजस्वी यादव नीतीश कुमार के मानसिक स्थिति पर सवाल उठा रहे हैं.सुशासन देने का वडा कर रहे हैं लेकिन उनकी इस कोशिश को उनके लोग ही पलीता लगा दे रहे हैं.अब रीतलाल यादव की गुंडागर्दी फिर से बिहार के लोगों के जेहन में लालू के जंगल राज की याद दिला रहा है.लोगों के मन में सवाल हा- क्या ऐसे लोगों को साथ लेकर तेजस्वी यादव सुशासन दे सकते हैं जिस तरह से नीतीश कुमार ने अनंत सिंह जैसे बाहुबली को साथ लेकर भी जंगल राज का अहसास लोगों को नहीं होने दिया.