बिहार की सियासत सबसे ज्यादा चर्चा में हैं प्रशांत किशोर और मुकेश सहनी?

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सिटी पोस्ट लाइव : बिहार की सियासत में दो नेता प्रशांत किशोर और मुकेश सहनी सेंटर स्टेज में हैं. दोनों नेता हॉट केक बने हुए हैं. प्रशांत किशोर उर्फ PK नेताओं की पोल-पट्टी खोलने का अभियान छेड़े हुए हैं. उनके निशाने पर सीएम नीतीश कुमार, डेप्युटी सीएम सम्राट चौधरी, मंत्री मंगल पांडेय और अशोक चौधरी अब तक आ चुके हैं. तेजस्वी यादव को तो शुरू से ही वे नौवीं फेल बता कर उनकी नॉलेज पर सवाल उठाते रहे हैं. मुकेश सहनी ने डेप्युटी सीएम के पद और 60 सीटों की ऐसी शर्त महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव के सामने रख दी है कि उन्हें न निगलते बन रहा और न उगलते. उनके एनडीए में जाने की चर्चा फिर जोरों पर है.

प्रशांत किशोर ने सबसे पहले नीतीश कुमार को निशाने पर लिया. उन्हें मानसिक रूप से बीमार बताते हुए कहा कि नीतीश को अपने मंत्रियों के नाम तक याद नहीं हैं. बिहार की 13 करोड़ जनता राम भरोसे है. भ्रष्टाचार नीतीश शासन में खूब पनपा-फला है. लालू यादव और राबड़ी देवी के शासन के अलावा 20 साल नीतीश कुमार के शासन में बिहार की दुर्गति ही हुई है. विकास के बजाय बिहार पीछे गया है. उनकी नजर में बिजली, पानी और सड़क ही विकास का पैमाना नहीं है. शिक्षा का स्तर गिरा है. उद्योग-धंधों के अभाव में पलायन की रफ्तार तेज हुई है. यानी लालू परिवार और नीतीश कुमार के शासन के 35 साल में बिहार का बंटाधार हुआ है.

प्रशांत किशोर ने जेडीयू के बड़े नेता और नीतीश के करीबी मंत्री अशोक चौधरी पर हमलावर हैं. उन्होंने दावा किया है कि अशोक चौधरी ने अपनी सांसद बेटी शांभवी चौधरी को लोजपा (आर) का टिकट दिलाने के लिए चिराग पासवान को पैसे दिए थे. अशोक चौधरी ने इसे आपत्तिजनक टिप्पणी करार देते हुए प्रशांत किशोर को पहले कानूनी नोटिस भेजा. उनके जवाब को संतोषजनक नहीं मानते हुए मानहानि का मामला भी दर्ज कराया है. अशोक का कहना है कि प्रशांत किशोर पैसे के व्यापारी हैं. वे पैसे लेकर दूसरी पार्टियों को अपनी सेवा देते रहे हैं. हालांकि उसके बाद प्रशांत किशोर ने सिर्फ इतना ही कहा कि वे अपने स्टैंड पर कायम हैं. बहरहाल, इस मामले पर दोनों ओर से कोई बयानबाजी नहीं हो रही.

PK के निशाने पर पहले ज्यादा नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव थे.लेकिन अब बीजेपी के नेता सबसे अधिक हैं. सबसे पहले उन्होंने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल को निशाने पर लिया. उन पर माइनारिटी मेडिकल कालेज पर कब्जा जमाने का आरोप लगाया. प्रशांत किशोर के आरोप में कितना दम है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन शुरुआती इनकार के बाद अब दिलीप जायसवाल खामोश हो गए हैं. चर्चा तो यह भी है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इस मामले में उनसे सफाई मांगी है. उनकी चुप्पी को लेकर ये भी कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रदेश अध्यक्ष पद से उनकी छुट्टी भी हो सकती है. जायसवाल के बाद प्रशांत ने भाजपा कोटे के मंत्री मंगल पांडेय को निशाने पर लिया. उन पर भ्रष्टाचार के आरोप मढे. मंगल पांडेय ने प्रशांत के आरोपों को खारिज तो किया, लेकिन उसका प्रतिकार उस रूप में नहीं किया, जैसा जेडीयू कोटे के मंत्री अशोक चौधरी ने किया. अब उन्होंने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे और मौजूदा डेप्युटी सीएम सम्राट चौधरी के हलफनामे में गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं. प्रशांत उनके बारे में और भंडाफोड़ करने की बात कह रहे हैं.

प्रशांत किशोर अपने पोल खोल अभियान की वजह से चर्चा में हैं तो मुकेश सहनी अपनी कड़ी शर्तों के कारण. मुकेश सहनी महागठबंधन में शामिल हैं. लेकिन एनडीए उनको अपने पाले में लाने में जुटा है. हालांकि वे इस तरह की किसी भी संभावना से इनकार करते हैं. पर, ऐसे 3 कारण हैं, जिनके आधार पर एनडीए की ओर उनके झुकाव की चर्चा चल रही है. पहला यह कि वे 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए में रह कर चुनाव लड़े थे. दूसरा कि वे महागठबंधन में 60 सीटें और डेप्युटी सीएम का पद मांग रहे हैं, जो संभव नहीं दिखता. तीसरा कारण महागठबंधन की हाल में हुई बैठक से उनकी अनुपस्थिति है. इस बीच वे दिल्ली के दौरे पर भी गए. लगे हाथ इस सवाल पर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने भी कह दिया कि राजनीति में कुछ भी संभव है. मुकेश सहनी दावे के साथ कहते हैं कि वे महागठबंधन नहीं छोड़ेंगे, लेकिन उनकी शर्तें ऐसी हैं कि 2020 की तरह उन्हें खफा होकर एनडीए की ओर जाना पड़ सकता है. वे कहते हैं कि तेजस्वी सीएम बनेंगे तो उनका डेप्युटी सीएम बनना पक्का है. हाल ही उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से एक पोस्ट किया था, जिसमें 60 सीटों का संकल्प दर्ज था. इसे राजनीतिक विश्लेषक उनके महागठबंधन छोड़ने का पैंतरा मान रहे हैं.

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