सिटी पोस्ट लाइव
बिहार में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका ताजा उदाहरण बेतिया में देखने को मिला। यहाँ शिक्षा विभाग के एक सहायक इंजीनियर (असिस्टेंट इंजीनियर) रौशन कुमार के घर जब विजिलेंस की टीम ने दबिश दी, तो अधिकारियों की आँखें फटी की फटी रह गईं। कहने को तो रौशन कुमार एक सरकारी कर्मचारी हैं, लेकिन उनके घर के भीतर का नजारा किसी ‘काली कमाई के कुबेर’ जैसा था।
₹5 लाख का ‘ट्रैप’ और ₹47 लाख का ‘खजाना’
विशेष सतर्कता इकाई (SUV) को सूचना मिली थी कि इंजीनियर रौशन कुमार ₹5 लाख की रिश्वत लेने वाले हैं। डीएसपी सुधीर कुमार के नेतृत्व में टीम ने जाल बिछाया और रौशन को रंगे हाथ दबोच लिया। लेकिन असली कहानी रिश्वत की इस रकम के बाद शुरू हुई। जब टीम ने घर की तलाशी लेनी शुरू की, तो अलमारियों और कमरों से नोटों की गड्डियाँ इस कदर निकलने लगीं कि हाथ से गिनती करना नामुमकिन हो गया।
अधिकारियों के मुताबिक, हालत ऐसी थी कि नोटों को देखकर ऐसा लगा मानो उनसे एक डबल बेड तैयार किया जा सकता हो। आनन-फानन में नोट गिनने वाली मशीन मंगवाई गई। देर रात तक चली इस प्रक्रिया में कुल ₹47 लाख का कैश बरामद हुआ। इसमें ₹5 लाख वह थे जो रिश्वत के तौर पर लिए गए थे, जबकि ₹42 लाख घर के अलग-अलग हिस्सों में छिपाकर रखे गए थे।
वेतन ₹70 हजार और कैश ₹47 लाख: गणित से बाहर की कमाई
जांच अधिकारियों ने इस काली कमाई के गणित को समझाते हुए बताया कि एक असिस्टेंट इंजीनियर को तमाम भत्ते जोड़कर करीब ₹70,000 प्रति माह वेतन मिलता है। अगर वह अपनी पूरी सैलरी भी बचाए, तब भी ₹42 लाख जमा करने में उसे 6 से 7 साल लगेंगे, वह भी बिना एक पैसा खर्च किए। ऐसे में इतनी बड़ी नकदी का मिलना साफ तौर पर पद के दुरुपयोग और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
अब ‘सोर्स’ की तलाश में जुटी विजिलेंस
सोमवार की पूरी रात इंजीनियर के घर पर गहमागहमी बनी रही। विजिलेंस की टीम अब यह पता लगा रही है कि यह पैसा किस-किस योजना के भ्रष्टाचार से जुटाया गया था। क्या इस खेल में विभाग के कुछ और बड़े चेहरे भी शामिल हैं? रौशन कुमार की अन्य संपत्तियों और बैंक खातों को भी खंगाला जा रहा है।