चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में ‘मुन्ना भाई’ बनने की चाहत ने समय-समय पर अपने तरीके बदले हैं। कभी 80 के दशक में नकल का सहारा लिया जाता था, तो 90 के दशक में ‘इंजन’ (डमी छात्र) के जरिए ‘बोगी’ (असली छात्र) को मेडिकल कॉलेज की दहलीज पार कराई जाती थी। जब पेपर लीक का जोखिम बढ़ा, तो साठगांठ के नए रास्ते तलाशे गए। लेकिन पूर्णिया के राजकीय मेडिकल कॉलेज में जो खुलासा हुआ है, उसने जालसाजी के एक ऐसे घिनौने और ‘सुरक्षित’ तरीके को बेनकाब किया है, जिसने व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं। यह नया हथियार है— फर्जी दिव्यांग प्रमाण-पत्र।

पूर्णिया से फूटा फर्जीवाड़े का घड़ा:
राजकीय मेडिकल कॉलेज, पूर्णिया (स्थापना 2023) में यह खेल तब उजागर हुआ, जब 2025 सत्र के लिए नामांकन कराने आए कार्तिक यादव पर कॉलेज प्रबंधन को संदेह हुआ। जांच हुई तो कार्तिक का दिव्यांग प्रमाण-पत्र फर्जी निकला और वह सलाखों के पीछे पहुँचा। इस एक सुराग ने कॉलेज प्रशासन को पिछले वर्षों के रिकॉर्ड खंगालने पर मजबूर कर दिया।

जब 2023 और 2024 में नामांकित दिव्यांग छात्रों के दस्तावेजों की स्क्रूटनी की गई, तो नतीजे चौंकाने वाले थे:
– कुल 10 दिव्यांग सीटों में से 7 छात्र फर्जी पाए गए।
– इन छात्रों ने बनारस, चंडीगढ़, कोलकाता और मुंबई जैसे बड़े शहरों के नामचीन अस्पतालों के जाली प्रमाण-पत्र पेश किए थे।
हैरानी की बात यह है कि सभी 7 छात्रों ने ‘हियरिंग इम्पेयरमेंट’ (श्रवण दिव्यांगता) को ही ढाल बनाया था।
‘कान’ ही क्यों बना जालसाजों की पसंद?
विशेषज्ञों के अनुसार, सुनने की अक्षमता का प्रमाण-पत्र बनवाना जालसाजों के लिए सबसे ‘आसान’ होता है। ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. शंभु कुमार बताते हैं कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत 40 डेसिबल या उससे अधिक का हियरिंग लॉस दिव्यांगता की श्रेणी में आता है। इसे पकड़ना शारीरिक दिव्यांगता (लोकोमोटर) की तुलना में थोड़ा जटिल होता है, क्योंकि यह बाहर से दिखाई नहीं देता। इसी तकनीकी पेच का फायदा उठाकर ‘सेटर’ गिरोह छात्रों को मेडिकल कॉलेज में ‘एंट्री’ दिला रहे हैं।

व्यवस्था पर सवाल: देरी क्यों?
इस पूरे मामले में पूर्णिया मेडिकल कॉलेज प्रशासन की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है।
1) देरी का कारण: 2023 और 2024 के छात्रों की जांच 2025 में क्यों हुई? जबकि नामांकन के समय ही दस्तावेजों के सत्यापन की सख्त प्रक्रिया निर्धारित है।
2) राष्ट्रीय रैकेट की आशंका: देशभर के सरकारी कॉलेजों में करीब 65,000 सीटों में से 5% (लगभग 3,000+ सीटें) दिव्यांगों के लिए आरक्षित हैं। यदि एक छोटे और नए कॉलेज में 70% दिव्यांग सीटें फर्जी पाई गईं, तो राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा कितना भयावह होगा?
हकमारी और नैतिक पतन:
यह सिर्फ एक कानूनी अपराध नहीं है, बल्कि उन वास्तविक दिव्यांग उम्मीदवारों की ‘हकमारी’ है जो अपनी शारीरिक चुनौतियों से लड़कर दिन-रात मेहनत करते हैं। फर्जीवाड़े से डॉक्टर बनने वाले ये छात्र भविष्य में समाज को कैसा स्वास्थ्य ढांचा देंगे, यह कल्पना ही डरावनी है। हालांकि, प्राचार्य डॉ. हरिशंकर मिश्रा ने कार्रवाई करते हुए इन छात्रों का नामांकन रद्द कर दिया है और सरकार को पत्र लिखा है। लेकिन सवाल वही है— क्या यह सिर्फ पूर्णिया की कहानी है या पूरे देश के मेडिकल कॉलेजों में ‘मुन्ना भाइयों’ ने दिव्यांगता का चोगा ओढ़ रखा है?