बिहार में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के कार्यान्वयन में एक बड़ी बाधा सामने आई है। निजी स्कूलों की लापरवाही के कारण हजारों गरीब बच्चों का भविष्य अधर में लटकता नजर आ रहा है।

संकट का मुख्य कारण: पोर्टल पर डेटा की कमी
राज्य के लगभग 52 प्रतिशत निजी स्कूलों ने अब तक ‘ज्ञानदीप पोर्टल’ पर अपनी रिक्त सीटों की जानकारी साझा नहीं की है।
– कुल मान्यता प्राप्त निजी स्कूल: 15,919
– डिफॉल्टर स्कूल (जिन्होंने जानकारी नहीं दी): 8,217
– निर्धारित समय-सीमा: 31 दिसंबर (जो बीत चुकी है)

नामांकन पर क्या होगा असर?
पोर्टल पर डेटा अपडेट न होने की वजह से नामांकन की पूरी प्रक्रिया तकनीकी रूप से अटक गई है। इससे होने वाले संभावित नुकसान निम्नलिखित हैं:
1) 80 हजार बच्चों पर संकट: अनुमान है कि इस साल करीब 80 हजार वंचित और कमजोर वर्ग के बच्चे दाखिले से वंचित रह सकते हैं।
2) प्रक्रिया में देरी: जब तक सीटें पोर्टल पर नहीं दिखेंगी, तब तक ऑनलाइन आवेदन और लॉटरी की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाएगी।
3) अभिभावकों में बढ़ती चिंता: समय निकलने के कारण अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य को लेकर डरे हुए हैं।

जिलों की स्थिति:
जहाँ एक ओर पूरे राज्य में स्थिति चिंताजनक है, वहीं पटना जिला एक सकारात्मक उदाहरण पेश कर रहा है। यहाँ के 935 स्कूलों ने समय पर अपनी सीटों की जानकारी अपडेट कर दी है, जो राज्य में सबसे बेहतर प्रदर्शन है। वहीं, अधिकांश अन्य जिलों में स्कूलों का रवैया बेहद सुस्त रहा है, जिसके कारण विभाग की योजनाएं विफल होती दिख रही हैं।
शिक्षा विभाग का अगला कदम:
इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए विभाग अब कड़े रुख अपनाने की तैयारी में है। डिफॉल्टर स्कूलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार किया जा रहा है। विभाग जल्द ही डेडलाइन बढ़ाने पर निर्णय ले सकता है ताकि छूटे हुए स्कूल अपनी जानकारी अपलोड कर सकें। विभाग का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि तकनीकी कारणों से किसी भी गरीब बच्चे का शिक्षा का अधिकार न छीना जाए।