सिटी पोस्ट लाइव
पटना। बिहार की राजनीति में काफी उथल-पुथल देखने को मिल रहा है। मोतिहारी में हुई “नौकरी दो, पलायन रोको” यात्रा के दौरान कैन्हैया ने मीडिया से दूरी क्या बनाई, सियासी गलियारों में सबके कान खड़े हो गए। वहीं तेजस्वी की शिकायत ने आग में घी का काम दिया। सब कह रहे हैं कि राहुल गांधी ने बिहार कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अखिलेश सिंह को हटा दिया है, लेकिन सच यह है कि राहुल गांधी ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को बिहार कांग्रेस के सुपर अध्यक्ष पद से हटा दिया है। ये कोई आश्चर्य करने वाली बात नहीं है। यही हुआ है। राहुल गांधी को यही बात समझ आई और समझाई गई कि अखिलेश प्रसाद सिंह के ज़रिए लालू प्रसाद यादव बिहार में कांग्रेस को चलाते हैं। अखिलेश सिंह एक भी बड़ा फ़ैसला बिना लालू से पूछे नहीं लेते।
बिहार में कांग्रेस को कौन चाहिए
हालांकि, अखिलेश प्रसाद सिंह सोनिया गांधी के भरोसेमंद थे। उन्हें हटाना इतना आसान नहीं था, इसलिए राहुल गांधी भी शिकायतें सुन रहे थे और इंतज़ार कर रहे थे। हालांकि, जब अखिलेश सिंह को लगा कि नए प्रभारी कृष्णा अल्लावरु बिहार में कन्हैया को आगे बढ़ा रहे हैं, तो उन्होंने आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बेटे और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव से सोनिया गांधी और राहुल गांधी को फ़ोन करवा दिया। तेजस्वी यादव ने सीधे-सीधे तो नहीं, लेकिन इशारों ही इशारों में राहुल गांधी को कह डाला कि कन्हैया और राजद में कांग्रेस को बिहार में कौन चाहिए, यह चुनना होगा।
इसके बाद, राहुल गांधी ने भी कुछ फ़ोन घुमाया और उन्हें पता चल गया कि इस फ़ोन के पीछे अखिलेश सिंह हो सकते हैं। बस फिर फ़ैसला हो गया कि अब अखिलेश सिंह को बिहार अध्यक्ष से हटा देना है और बिहार कांग्रेस कमेटी के नए अध्यक्ष के तौर पर औरंगाबाद के कुटुंबा से विधायक और कांग्रेस के दलित चेहरे राजेश कुमार को चुना गया। अब अध्यक्ष भले ही राजेश कुमार होंगे, लेकिन अभी से लेकर चुनाव तक सुपर अध्यक्ष की भूमिका में कृष्णा अल्लावरु ही रहेंगे।
राहुल गांधी ने छेड़ दी जंग
दरअसल, राहुल गांधी ने अखिलेश सिंह को नहीं हटाया, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को बिहार में कांग्रेस के सुपर अध्यक्ष की भूमिका से हटा दिया है। अखिलेश सिंह पर आरोप था कि वे कांग्रेस को लालू प्रसाद यादव के मर्जी के मुताबिक चलाते हैं। अखिलेश को हटाकर राहुल गांधी ने बिहार में कांग्रेस के खिलाफ जंग छेड़ दी है। बिहार में इस बात का जवाब बिहार कांग्रेस के नए प्रभारी कृष्णा अल्लावरु इशारों में दे चुके हैं।
हाल ही में उन्होंने पटना एयरपोर्ट पर साफ़ कह दिया था कि कांग्रेस अब बिहार की A टीम बन कर काम करेगी। ये कांग्रेस का बिहार को लेकर इरादा बताने के लिए काफी था। ऐसा नहीं है कि अब कांग्रेस और राजद के बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन सुलह तब होगी जब तेजस्वी यादव झुकेंगे। क्योंकि कांग्रेस के पास बिहार में खोने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए बहुत कुछ। एक बड़े बीजेपी नेता की मानें, तो बीजेपी नहीं चाहती कि कांग्रेस बिहार में अकेले चुनाव लड़े, क्योंकि ऐसा होने पर कांग्रेस का पुराना आधार वोटर, सवर्ण वोटर (भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ) फिर से कांग्रेस का रुख कर लेता है।
दलित समाज से आते हैं राजेश
बिहार का यह वोटर राजद के साथ होने की वजह से कांग्रेस को वोट नहीं करता, लेकिन जैसे ही कांग्रेस राजद से अलग होती है, सवर्ण मदताता कांग्रेस से फिर से जुड़ने लगता है। अखिलेश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर उनकी जगह पार्टी के विधायक राजेश कुमार को नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। राजेश कुमार दलित समाज से आते हैं। उन्हें अध्यक्ष बनाकर सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की गई है।
पार्टी के अंदरूनी मतभेद और प्रदेश इकाई में लगातार उठ रहे असंतोष की वजह से अखिलेश सिंह को हटाया गया है। राजेश कुमार के नेतृत्व में पार्टी अब नई रणनीति के तहत काम करेगी। राजेश कुमार औरंगाबाद के कुटंबा से विधायक हैं। चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के जरिए एनडीए ने कांग्रेस के दलित वोट बैंक में सेंधमारी की थी। कांग्रेस ने इसे वापस लाने की कोशिश की है। पिछले प्रभारी भक्त चरण दास ने इन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने की कोशिश की थी लेकिन वो सफल नहीं हो पाए थे।
खड़गे को लिखा था पत्र
अखिलेश सिंह पर सेल्फ इंटरेस्ट में पॉलिटिक्स करने का आरोप लगता रहा है। उनका राज्यसभा का टर्म पूरा हो गया था, वे चाहते तो किसी अन्य कांग्रेसी को मौका दे सकते थे, लेकिन दोबारा कांग्रेस से राज्यसभा गए। बेटे आकाश को महाराजगंज से टिकट दिलवाया। आकाश, बीजेपी नेता जनार्दन सिंह सिग्रीवाल से हार गए। किसान कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष धीरेंद्र कुमार सिंह ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह पर बड़े और गंभीर आरोप जून माह में लगाए थे। उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखा था। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि टिकट बंटवारे में लेन-देन किया गया।
बाहरी प्रत्याशी को टिकट दिया। गलत नीति और राजद से प्रेम के चलते ही पार्टी को बिहार में तीन सीटों पर संतोष करना पड़ा। कांग्रेस को नौ में से सात सीटों पर जीत तय थी। कांग्रेस से 9 उम्मीदवारों को टिकट दिया गया था। नौ में से चार सीटों पर नेताओं के बेटे को लड़वाया गया। तीन उम्मीदवार ऐसे थे, जिन्होंने कभी न कभी पाला बदला था। अंशुल अविजीत, मीरा कुमार के बेटे हैं, वे पटना साहिब से चुनाव लड़े। सन्नी हजारी को समस्तीपुर से टिकट मिला। उनके पिता महेश्वर हजारी जेडीयू से सरकार में मंत्री थे और कांग्रेस का टिकट बेटे आकाश सिंह को मिल गया। अजय निषाद को मुजफ्फरपुर से टिकट मिला। वे चुनाव से पहले बीजेपी से कांग्रेस में शामिल हुए थे। उनके पिता कैप्टन जयनारायण निषाद मुजफ्फरपुर से दो बार सांसद रह चुके थे। सभी नेताओं के बेटे चुनाव हार गए।
मनोज कुमार को सासाराम से टिकट मिला। वे बसपा से कांग्रेस में आए थे। अजीत शर्मा को भागलपुर से टिकट मिला, वे भागलपुर के विधायक हैं। लेकिन 2009 में अजीत शर्मा बसपा से चुनाव लड़े थे। तारिक अनवर को कटिहार से टिकट मिला था। उन्होंने तो कांग्रेस छोड़ शरद पवार के साथ मिलकर एनसीपी बना ली थी। कटिहार से एनसीपी के टिकट पर सांसद भी रह चुके हैं। टिकट बंटवारे पर कई तरह से सवाल उठे। इससे यह भी मैसेज गया कि राजपूतों-भूमिहारों का वोट ट्रांसफर कराने में अखिलेश असफल रहे।
अखिलेश प्रसाद सिंह ने कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में श्री कृष्ण सिंह की जयंती का भव्य आयोजन किया था। उसमें आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव मुख्य अतिथि थे। लालू प्रसाद ने मंच से कहा कि था कि ‘अखिलेश प्रसाद सिंह को पहली बार मैंने ही राज्यसभा भिजवाया। इसके लिए जेल से ही फोन पर सोनिया गांधी से पैरवी की। ऐसे भी लालू प्रसाद और अखिलेश प्रसाद सिंह की निकटता काफी रही है। पार्टी के अंदर और बाहर कई नेता ऐसा मानते हैं कि बिहार में कांग्रेस इसलिए मजबूत नहीं हो पा रही कि लालू प्रसाद नहीं चाहते। इसका उदाहरण लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिला।
देखती रह गई कांग्रेस
पप्पू यादव ने अपनी पार्टी जाप का विलय कांग्रेस में कर दिया, लेकिन पप्पू यादव को मनचाही जगह पूर्णिया से कांग्रेस टिकट नहीं दे पाई। लालू प्रसाद ने जेडीयू से आरजेडी में लाकर बीमा भारती को पूर्णिया से आरजेडी का टिकट दे दिया। कांग्रेस देखती रह गई। पप्पू यादव निर्दलीय लड़कर जीत गए। दो साल पहले अखिलेश प्रसाद सिंह को ऐसे समय में कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था, जब इनके पास इतना समय नहीं था कि वे लोकसभा चुनाव और विधान सभा चुनाव की बेहतर तैयारी करते। इससे यह हुआ कि कांग्रेस को विधान सभा में टूट से नहीं बचा सके। कांग्रेस के दो विधायकों ने पार्टी का साथ छोड़ दी थी। पूर्व मंत्री और विधायक मुरारी गौतम और विधायक सिद्धार्थ गौतम ने बगावत कर दिया।
अखिलेश प्रसाद बिहार कांग्रेस की प्रदेश कमेटी का गठन अब तक नहीं कर पाए हैं। पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार की नाराजगी भी लोकसभा चुनाव के समय दिखी थी। लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और लालू प्रसाद के धुर विरोधी नेता अनिल शर्मा ने कांग्रेस छोड़ बीजेपी जॉइन कर लिया। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने भी कांग्रेस छोड़ बीजेपी में जाना सही समझा। जमीनी स्तर पर अखिलेश सिंह की कमजोर पकड़ है। यही वजह है कि उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ने की बजाय दो बार राज्यसभा जाना सही समझा।
भुमिहार वोटरों को साथ जोड़ने की कवायद
बेटे को पिछली बार भी लोकसभा चुनाव में नहीं जितवा पाए थे। इस बार भी आकाश की हार हुई। संगठन के निचले स्तर के नेताओं-कार्यकर्ताओं को मिलने में भी कठिनाई होती रही है। अखिलेश प्रसाद सिंह लोकसभा सहित कई सदनों के सदस्य रह चुके हैं, लेकिन अब भी राजनीति में उनकी रणनीति से पार्टी बिहार विधानसभा में कमजोर हुई है। कांग्रेस को सिर्फ एक बात की चिंता थी कि क्या अखिलेश सिंह को हटाने से बिहार का भूमिहार वोटर नाराज़ हो जाएगा? इसीलिए कांग्रेस ने अखिलेश को हटाने से पहले बिहार की राजनीति में कन्हैया कुमार की एंट्री करवा दी। कन्हैया कुमार भी भूमिहार जाति से ही आते हैं। वे बिहार के बेगूसराय के रहने वाले हैं।
कन्हैया को बिहार की राजनीति में आगे करके कांग्रेस ने भूमिहार मतदाताओं को भी रुठने से बचाने की कोशिश की है। क्योंकि जब से कन्हैया कुमार बिहार आए थे, तब से ही बिहार में लड़ाई दो भूमिहारों A और K के बीच हो गई थी। A यानी अखिलेश और K यानी कन्हैया। कन्हैया को प्रभारी कृष्णा अल्लावरु और पूर्णिया सांसद पप्पू यादव का पूरा सपोर्ट मिला है। पप्पू यादव ने तो सिटी पोस्ट लाइव से खास बातचीत में यहां तक कह दिया कि कन्हैया और वे हवा और तूफ़ान हैं। जिन्हें लालू क्या कोई भी नहीं रोक सकता। तो अब A और K की लड़ाई में K यानी कन्हैया जीत गए हैं। अब कांग्रेस इस लड़ाई में जीतती है या नहीं, यह जानने के लिए हमें थोड़ा इंतज़ार करना होगा।