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बिहार की राजनीति में उस वक्त बड़ी हलचल मच गई, जब पटना हाईकोर्ट ने नवादा के पूर्व बाहुबली विधायक राजबल्लभ यादव को एक नाबालिग छात्रा से बलात्कार के आरोप से बरी कर दिया। निचली अदालत ने उन्हें इस मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के कमजोर सबूतों के आधार पर यह फैसला पलट दिया। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, जिससे इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं।
यह मामला 2016 का है, जब एक 15 वर्षीय छात्रा ने राजबल्लभ यादव पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था। छात्रा का आरोप था कि उसे जन्मदिन की पार्टी के बहाने बिहारशरीफ स्थित राजबल्लभ के आवास पर ले जाया गया, जहां उसे नशीला पदार्थ देकर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। इस घटना के बाद 9 फरवरी 2016 को मामला दर्ज किया गया और पुलिस जांच के बाद 10 मार्च 2016 को राजबल्लभ ने आत्मसमर्पण कर दिया। नवादा की विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने 15 दिसंबर 2018 को 20 गवाहों की गवाही के आधार पर राजबल्लभ को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा-376 (बलात्कार), धारा-120B (आपराधिक साजिश) और POCSO एक्ट के तहत दोषी ठहराया था।
हाईकोर्ट के फैसले का आधार
पटना हाईकोर्ट की जस्टिस मोहित कुमार शाह और जस्टिस हरीश कुमार की खंडपीठ ने 14 अगस्त 2025 को राजबल्लभ यादव और इस मामले के अन्य पांच आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष पीड़िता के आरोपों को “संदेह से परे” साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। बचाव पक्ष के वकीलों ने कोर्ट के सामने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और ठोस सबूतों की कमी को उजागर किया। कोर्ट ने पाया कि गवाहों की गवाही में कई असंगतियां थीं, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि पीड़िता का बयान किसी अन्य विश्वसनीय साक्ष्य से पुष्ट नहीं हो सका। सुप्रीम कोर्ट के “संदेह का लाभ” (benefit of doubt) के सिद्धांत को दोहराते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि बिना ठोस और विश्वसनीय सबूतों के किसी को भी दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है। इसी आधार पर राजबल्लभ की आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया गया।
कानूनी और राजनीतिक दांव-पेंच
यह फैसला कई कानूनी और राजनीतिक सवाल खड़े करता है। भारतीय कानून में POCSO एक्ट नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए सख्त सजा का प्रावधान करता है, लेकिन साथ ही ‘संदेह का लाभ’ का सिद्धांत भी लागू होता है। इस मामले में अभियोजन पक्ष की कमजोर पैरवी और गवाहों के बयानों में असंगतियों ने बचाव पक्ष को मजबूत कर दिया। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी? अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। अगर सरकार अपील नहीं करती है, तो विपक्ष इसे नीतीश सरकार की महिला सुरक्षा के प्रति उदासीनता के रूप में प्रचारित कर सकता है, जो आने वाले चुनावों में उनके लिए एक राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है।
1990 के दशक में ठेकेदारी से राजनीति में आए राजबल्लभ यादव 1995 में निर्दलीय और 2000 में आरजेडी से विधायक बने थे। 2015 में महागठबंधन के तहत नवादा से उनकी जीत हुई थी। उनके विरोधियों का मानना है कि उनकी बाहुबली छवि और राजनीतिक प्रभाव ने शायद इस मामले में उनकी मदद की हो। इस फैसले से बिहार की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं, और यह देखना बाकी है कि आगामी चुनावों में यह किस तरह का प्रभाव डालेगा।