बिहार राज्यसभा चुनाव: तेजस्वी की ‘अग्निपरीक्षा’, क्या आईपी गुप्ता के जरिए ओवैसी के साथ पकेगी सियासी बिरयानी?

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने राज्य की राजनीति को बेहद दिलचस्प मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। विधानसभा में संख्या बल के लिहाज से कमजोर दिख रहे महागठबंधन और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने हार नहीं मानी है। सूत्रों की मानें तो तेजस्वी यादव ने पांचवीं सीट पर कब्जा जमाने के लिए ‘मिशन हैदराबाद’ शुरू किया है, जिसकी जिम्मेदारी आईआईपी (IIP) विधायक आईपी गुप्ता को सौंपी गई है।

नंबर गेम: एनडीए बनाम महागठबंधन
बिहार में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए कम से कम 41 (40.5) विधायकों के समर्थन की आवश्यकता है। एनडीए के पास कुल 202 विधायक हैं, जिसका अर्थ है कि उनके पास 4 सीटें जीतने के बाद पांचवीं सीट के लिए 38 विधायक बचते हैं। उन्हें केवल 3 अतिरिक्त विधायकों की जरूरत है।

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दूसरी ओर, महागठबंधन के पास 35 विधायकों का ठोस आधार है। तेजस्वी यादव को पांचवीं सीट सुरक्षित करने के लिए कम से कम 6 अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की दरकार है। यही कारण है कि अब सबकी नजरें असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) के 5 विधायकों और मायावती की बसपा (BSP) के 1 विधायक पर टिक गई हैं।

हैदराबाद में ‘गुप्त’ संदेश और ओवैसी का रुख
चर्चा है कि हाल ही में आईपी गुप्ता का हैदराबाद दौरा महज शिष्टाचार नहीं था। तेजस्वी यादव ने उनके जरिए ओवैसी तक एक ‘खास संदेश’ भिजवाया है। विधानसभा चुनाव के दौरान ओवैसी को गठबंधन से दूर रखने वाले तेजस्वी अब राज्यसभा के लिए उनका साथ चाह रहे हैं। हालांकि, ओवैसी की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट ‘ग्रीन सिग्नल’ नहीं मिला है। राजनीति के गलियारों में इसे ‘हैदराबाद वाली सियासी बिरयानी’ कहा जा रहा है, जिसका स्वाद चुनाव के नतीजों के बाद ही पता चलेगा।

RJD के लिए वजूद की लड़ाई: 2030 का डर
तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं, बल्कि भविष्य के अस्तित्व का सवाल है। वर्तमान में आरजेडी के पास राज्यसभा में 4 सांसद हैं। प्रेमचंद गुप्ता और एडी सिंह का कार्यकाल अब समाप्त हो रहा है। यदि आरजेडी इस बार अपनी सीटें नहीं बचा पाती, तो 2030 तक राज्यसभा में राजद का प्रतिनिधित्व शून्य होने का खतरा मंडरा रहा है।

खबर यह भी है कि तेजस्वी अपने पुराने वफादार प्रेमचंद गुप्ता को झारखंड से राज्यसभा भेजने की जुगत में हैं, जहाँ हेमंत सोरेन के पिता शिबू सोरेन के निधन के बाद सीट खाली हुई है। हालांकि, झारखंड में सीटों के बंटवारे को लेकर हेमंत सोरेन की कथित नाराजगी तेजस्वी की राह में रोड़ा बन सकती है।

मायावती और ओवैसी की ‘शर्तें’ क्या होंगी और क्या वे तेजस्वी के दूतों की बात मानेंगे, यह आने वाले कुछ दिनों में साफ हो जाएगा। फिलहाल एनडीए 3 विधायकों के अंतर के साथ मजबूत स्थिति में है, जबकि महागठबंधन 6 विधायकों के फासले को पाटने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है।

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