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बिहार की सियासत में इन दिनों एक ही सवाल तैर रहा है—क्या केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान अपनी मां रीना पासवान को राज्यसभा भेजेंगे? 16 मार्च 2026 को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए बिहार की 5 सीटों पर नामांकन की प्रक्रिया जैसे-जैसे करीब आ रही है, एनडीए के भीतर ‘पांचवीं सीट’ को लेकर हलचल तेज हो गई है। चिराग पासवान की नजरें अब भाजपा के उस ‘पुराने वादे’ पर टिकी हैं, जो विधानसभा चुनाव के वक्त डैमेज कंट्रोल के दौरान किया गया था।
पांचवीं सीट का गणित: किसे चाहिए कितने वोट?
बिहार में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए कम से कम 41 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता है। एनडीए (NDA) के पास कुल 202 विधायक हैं। इस संख्या बल के आधार पर भाजपा और जदयू की 2-2 सीटें (कुल 4) पूरी तरह सुरक्षित हैं। इन 4 सीटों के बाद एनडीए के पास 38 विधायक बचते हैं। यानी पांचवीं सीट पर कब्जा करने के लिए एनडीए को मात्र 3 अतिरिक्त विधायकों की जरूरत है।
यही वह ‘स्लॉट’ है जहाँ चिराग पासवान अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं। हालांकि, इस रेस में जीतन राम मांझी की ‘हम’ और उपेंद्र कुशवाहा की ‘आरएलएम’ भी कतार में हैं, लेकिन 19 विधायकों के साथ चिराग का पलड़ा भारी नजर आ रहा है।
चिराग की ‘त्याग’ और बीजेपी का ‘इनाम’
चर्चा है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में सीट शेयरिंग के दौरान चिराग पासवान 35 सीटों की मांग पर अड़े थे। नीतीश कुमार के कड़े रुख के बाद भाजपा ने हस्तक्षेप किया और चिराग को 29 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए राजी किया। सूत्रों के अनुसार, उस वक्त भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने चिराग को भविष्य में एक राज्यसभा सीट देने का ‘भरोसा’ दिलाया था। 19 सीटें जीतकर चिराग ने खुद को राज्य में तीसरी बड़ी ताकत साबित किया है, और अब वे उसी ‘इनाम’ की प्रतीक्षा में हैं।
रीना पासवान: पार्टी के भीतर लगभग तय है नाम
पॉलिटिकल इनर सर्किल और लोजपा (रामविलास) के भीतरखाने से खबरें आ रही हैं कि यदि भाजपा से हरी झंडी मिलती है, तो चिराग पासवान अपनी मां रीना पासवान को राज्यसभा भेज सकते हैं। दिवंगत नेता रामविलास पासवान की विरासत को मजबूती देने और परिवार के भीतर संतुलन बनाए रखने के लिए यह चिराग का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। चिराग जानते हैं कि भाजपा सहयोगियों को नाराज नहीं करना चाहती, इसलिए वे फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की मुद्रा में हैं।
जहाँ चिराग आश्वस्त दिख रहे हैं, वहीं उपेंद्र कुशवाहा अपनी सीट बचाने की जद्दोजहद में हैं और मांझी भी अपने किसी करीबी को उच्च सदन भेजने की जुगत में हैं। अब गेंद भाजपा के पाले में है—क्या वह चिराग को उनकी वफादारी का इनाम देगी या सहयोगियों के बीच संतुलन बनाने का कोई नया फार्मूला निकालेगी?