गणतंत्र दिवस पर बिहार का गौरव: भोजपुरी संगीत के ‘भीष्म पितामह’ भरत सिंह भारती पद्मश्री से सम्मानित…

Ritu Raj

भोजपुरी लोक संगीत की दुनिया में ‘गुरुजी’ के नाम से विख्यात भरत सिंह भारती को साल 2026 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाना बिहार और लोक कला जगत के लिए एक गौरवपूर्ण क्षण है। भरत सिंह भारती का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि लक्ष्य बड़ा हो और लगन सच्ची, तो अभावों में भी इतिहास रचा जा सकता है। उनका पद्मश्री सम्मान दरअसल उस माटी की खुशबू का सम्मान है जिसे उन्होंने दशकों तक अपने गीतों में संजोकर रखा।

संघर्ष से शिखर तक का सफर;
भरत सिंह भारती का जन्म 1935 में भोजपुर के एक साधारण परिवार में हुआ। संगीत की भूख ऐसी थी कि महज 10 साल की उम्र से कीर्तन मंडलियों का हिस्सा बन गए। उन्होंने प्रसिद्ध गुरु शत्रुंजय प्रसाद सिंह (ललन जी) से दीक्षा ली और गायन के साथ-साथ तबला, बाँसुरी और सितार जैसे कई वाद्य यंत्रों में महारत हासिल की।

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विलुप्त होती परंपराओं के रक्षक;
– पवरिया और सोहर: नवजात के जन्म पर गाए जाने वाले गीत।
– डोमकच और जतसार: विवाह और चक्की पीसते समय गाए जाने वाले पारंपरिक गीत।
– विदेशिया और लोरी: समाज की मिट्टी से जुड़ी कलाकृतियाँ।

साधनहीनता में सादगी भरा संकल्प;
1970-80 के दशक में, जब बिजली और आधुनिक मंच नहीं थे, तब वे लालटेन की रोशनी में अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। साइकिल और बैलगाड़ी से गांव-गांव जाकर लोक संगीत की अलख जगाते थे। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी कला से कभी समझौता नहीं किया।

सांस्कृतिक गुरु और समाज सुधारक;
उन्होंने केवल संगीत नहीं गाया, बल्कि उसे एक आंदोलन बनाया:
1) नोनउर घराना: इसके माध्यम से 10 हजार से अधिक युवाओं को नि:शुल्क शिक्षा दी।
2) महिला सशक्तिकरण: ग्रामीण लड़कियों को संगीत के मंच तक लाने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही है।
3) संस्थागत ढांचा: पटना में ‘तारा इंस्टीट्यूट ऑफ लर्निंग’ और नोनउर में ‘भारती संगीत कला मंदिर’ की स्थापना कर उन्होंने लोक कला को एक स्थायी घर दिया।

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