BJP के मास्टर स्ट्रोक का कैसे जबाब देगें राहुल गांधी-तेजस्वी यादव,किसे मिलेगा फायदा.

City Post Live

सिटी पोस्ट लाइव :बीजेपी राजनीति को लेकर बहुत फ्लेक्सिबलहै. बिहार विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र की मोदी सरकार ने अपने फैसले को पलट दिया है. पहले जाति जनगणना नहीं कराने पर अड़ी सरकार ने अब कराने का ऐलान किया है. देश में पिछली जनगणना 2011 में हुई थी. इसे हर 10 साल में किया जाता है.ऐसे में चर्चा शुरू हो गई है कि क्या बिहार चुनाव में माइलेज लेने के लिए मोदी सरकार ने ये फैसला लिया है? क्या विपक्ष को मुद्दा विहीन करने की ये एक प्लानिंग है?

पुश नोटिफिकेशन के लिए सब्सक्राइब करें।

बिहार विधानसभा चुनाव में 5 महीने बाकी है. बड़ी विपक्षी पार्टियां RJD-कांग्रेस जाति जनगणना को बड़ा मुद्दा बना रही थी. भाजपा पर आरक्षण विरोधी का तमगा लगता रहा है, लेकिन इस दांव से उसने इसको उलटने का प्रयास किया है.साथ ही विपक्ष के सबसे बड़े मुद्दे को खत्म करने का प्रयास किया है. बिहार चुनाव एक बड़ा इश्यूज है. इससे बीजेपी को बिहार चुनाव में नफा ही होगा. एक दाव से उसने बड़े विपक्षी एजेंडे को समाप्त कर दिया. अब उन्हें दूसरा मुद्दा ढूंढना पड़ेगा. अब वे बस क्लेम कर सकते हैं कि हमने मुद्दा उठाया.’

BJP अब धर्म से हटकर जाति की पिच पर खेलना चाहती है. इसका असर बिहार विधानसभा चुनाव पर भी देखने को मिलेगा.राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा से ही जाति जनगणना कराने की मांग कर रहे थे. सरकार के इस फैसले  कांग्रेस पार्टी अपनी जीत मानर रही है.कांग्रेस पार्टी का कहना है कि उसके दबाव में  जाति जनगणना कराने को बीजेपी मजबूर हुई. लेकिन ये भी सच है कि ‘ऐसी योजनाओं का लाभ उसे ही मिलता है, जो इसकी घोषणा करता है. मंडल कमीशन का गठन कांग्रेस ने किया, लेकिन इसका लाभ वीपी सिंह को मिला. क्योंकि लागू उन्होंने ही कराया था.’

जनवरी से अब तक बिहार दौरे पर 3 बार आए कांग्रेस नेता राहुल गांधी जाति जनगणना के वादे करते रहे हैं. उन्होंने तो बिहार के जातीय सर्वे को फेक करार भी दिया था. उनकी एक मांग ये भी है कि जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसको उतनी भागीदारी.केवल राहुल गांधी ही नहीं बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव भी इसे पुरजोर तरीके से उठाते रहे हैं.‘विपक्ष केवल जनगणना तक सीमित नहीं है. राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव की मांग है कि जिसकी जितनी संख्या है, उसकी उतनी भागीदारी हो.’

जनगणना के बाद सरकार के सामने अगली चुनौती ये आने वाली है कि क्या जो 50 पर्सेट का कैप है, वो टूटेगा. इसे ऐसे मान लीजिए कि देश में पिछड़ों की आबादी 65 प्रतिशत है तो क्या इसका कैप बढ़ाया जाएगा. इस फैसले के बाद अब BJP के ऊपर आरक्षण की जो सीमा 50 फीसदी निर्धारित की गई है, उसे हटाने का दबाव बढ़ेगा. आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी देनी होगी. ऐसे में सवर्ण जो मौजूदा समय में BJP के साथ हैं, वे BJP का विरोध कर सकते हैं. यही कारण है कि BJP कभी भी आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी की बात नहीं करती है.

बीजेपी को लाभ- बिहार में भाजपा का आधार वोट सवर्ण और बनिया को माना जाता है. नीतीश कुमार जैसे सहयोगी उसके पास हैं, जो अतिपिछड़ा वोटबैंक को साधते हैं. जाति जनगणना का सबसे ज्यादा लाभ अतिपिछड़ा वर्ग (EBC) को हो सकता है.EBC में भाजपा ने हाल के दिनों में अपनी पैठ बनाया है. इस फैसले से पिछड़े और EBC में भाजपा के प्रति विश्वास बढ़ेगा. इसका फायदा चुनाव में दिख सकता है. क्योंकि ये जातियां लालू यादव से छिटकने के बाद अब तक नहीं जुड़ पाई हैं.’

‘बिहार में जातीय सर्वे कराना का क्रेडिट नीतीश कुमार को जाता है. उनके कार्यकाल में ही सर्वे हुआ. उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में इसका फायदा भी उन्होंने उठाया.लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी JDU को 18.9 फीसदी वोट मिला. पार्टी का स्ट्राइक रेट भी बेहतर रहा. 16 में से 12 कैंडिडेट चुनाव जीतने में सफल रहे थे.’लोकसभा के ट्रेंड को अगर विधानसभा में कन्वर्ट करें तो 15 साल बाद JDU एक बार फिर से बिहार विधानसभा में सबसे ताकतवर पार्टी के रूप में उभर सकती है. 243 विधानसभा सीटों में से 74 सीटों पर JDU आगे थी.

‘केंद्र के जातीय जनगणना के पूरा होने में अभी दो साल लगेंगे. इसी के आधार पर लोकसभा और विधानसभा का परिसीमन होना है. महिला का आरक्षण तय होना है. इसी के आधार पर 2029 का चुनाव होना है. ऐसे में बीजेपी और NDA सरकार को इसका लाभ होना तय माना जा रहा है. मोदी सरकार ने विपक्ष के इस मुद्दे को चुनाव से ही खत्म कर दिया. बिहार जैसे राज्य में जहां जाति काफी मायने रखती है, वहां अब विपक्ष को नया मुद्दा तलाशना होगा.

Share This Article