कर्तव्य पथ पर जिस डोर से फहराया जाता है तिरंगा, क्या आप जानते हैं कहाँ बुना जाता है उसका गौरवशाली धागा?…

Ritu Raj

हर साल 26 जनवरी को पूरा देश गणतंत्र दिवस के उत्साह में डूब जाता है। कर्तव्य पथ पर राष्ट्रपति भवन तक तिरंगा लहराता दिखता है, और हर किसी की नजरें उसकी गरिमा पर टिकी रहती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उस तिरंगे को ऊपर उठाने वाली वो खास रस्सी कहाँ से आती है? इस रस्सी की कहानी भी कम गौरवपूर्ण नहीं है—यह देशभक्ति, परंपरा और निरंतर समर्पण की जीती-जागती मिसाल है।

दिल्ली के सदर बाजार में कुतुब रोड के तेलीवाड़ा इलाके में बसी है एक मामूली-सी दिखने वाली दुकान गोरखी मल धनपत राय जैन फर्म। यही वह जगह है जहाँ से दशकों से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा फहराए जाने वाले तिरंगे के लिए रस्सी जाती रही है। यह दुकान सिर्फ व्यापार नहीं करती, बल्कि एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाती है जो आजादी के दौर से चली आ रही है। इस परंपरा की शुरुआत 1947 में हुई, जब 15 अगस्त को पहली बार स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री के लिए रस्सी इसी दुकान से भेजी गई। फिर 1950 में, जब देश ने पहला गणतंत्र दिवस मनाया, तब से राष्ट्रपति द्वारा किए जाने वाले ध्वजारोहण के लिए भी यही रस्सी इस्तेमाल हो रही है।

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आज इस फर्म की जिम्मेदारी पाँचवीं पीढ़ी के नरेश जैन संभाल रहे हैं। उनके लिए यह महज व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्र-सेवा का एक रूप है। वे कहते हैं कि जब रस्सी राष्ट्रपति भवन या कर्तव्य पथ के लिए जाती है, तो ऐसा लगता है मानो हम भी उस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बन रहे हों। शुरुआती वर्षों में इस रस्सी के लिए मामूली शुल्क लिया जाता था, लेकिन 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने पर फैसला हुआ कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के ध्वजारोहण के लिए रस्सी पूरी तरह मुफ्त दी जाएगी। तब से आज तक चाहे स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस यह रस्सी बिना किसी कीमत के उपलब्ध कराई जाती है। इन वर्षों में इस रस्सी से तिरंगा फहराने वाले कई बड़े नेता और राष्ट्रपति रहे हैं, जैसे अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह, नरेंद्र मोदी, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, प्रतिभा पाटिल, प्रणव मुखर्जी, राम नाथ कोविंद और वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू।

हर साल गणतंत्र दिवस से पहले भारतीय सेना के जवान खुद दुकान पर आते हैं और रस्सी को पूरे सम्मान के साथ ले जाते हैं। यह कोई साधारण लेन-देन नहीं होता—यह एक औपचारिक और भावुक प्रक्रिया है। ध्वजारोहण के बाद रस्सी को वापस भी भेजा जाता है, वो भी विशेष पैकिंग में, सरकारी मुहर लगाकर। साथ में एक प्रमाण-पत्र होता है जिसमें उस साल की तारीख, आयोजन और अन्य विवरण दर्ज रहते हैं। सेना की ओर से प्रशंसा-पत्र भी मिलता है, जिन्हें यह परिवार आज भी गर्व से संजोकर रखता है। यह छोटी-सी दुकान बताती है कि देशभक्ति सिर्फ बड़े मंचों पर नहीं, बल्कि साधारण-सी जगहों पर भी उतनी ही जीवंत रहती है। गोरखी मल धनपत राय जैन फर्म की यह रस्सी न सिर्फ तिरंगे को ऊपर उठाती है, बल्कि लाखों भारतीयों के दिलों में राष्ट्र-प्रेम की डोर भी मजबूत करती है।

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