निशांत कुमार के नाम पर ‘सियासी दुकानदारी’: उत्तराधिकारी बनाने की होड़ या अपनी राजनीति चमकाने का खेल? JDU में दो फाड़

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार की सियासत में इन दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को लेकर चर्चाओं का बाजार बेहद गर्म है। जेडीयू (JDU) के भीतर एक विशेष वर्ग निशांत को राजनीति में लाने और उन्हें नीतीश कुमार का ‘उत्तराधिकारी’ घोषित करने के लिए इस कदर बेचैन है कि राजधानी की सड़कें बैनर-पोस्टरों से पट गई हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यह बेचैनी केवल पार्टी प्रेम नहीं, बल्कि निशांत के बहाने अपनी ‘सियासी दुकानदारी’ चमकाने और नेतृत्व के करीब आने की एक सोची-समझी रणनीति है।

निशांत के बहाने ‘मसाला’ और दबाव की राजनीति
पिछले कुछ हफ्तों से जेडीयू प्रदेश कार्यालय और पटना की मुख्य सड़कों पर निशांत कुमार को पार्टी की कमान संभालने की गुजारिश करने वाले होर्डिंग्स लगाए जा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो पार्टी का एक गुट जानबूझकर हर दो-चार दिनों में इस मुद्दे को हवा देता है ताकि मीडिया में यह चर्चा बनी रहे। इस ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ के जरिए वे नेता खुद को नीतीश कुमार के प्रति सबसे वफादार साबित करना चाहते हैं, जबकि नेतृत्व पहले ही साफ कर चुका है कि ऐसा कोई भी फैसला केवल नीतीश कुमार ही लेंगे।

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ललन सिंह ने अटकलों को बताया ‘नकारात्मक चर्चा’
जेडीयू के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने इस पूरे मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करते हुए इसे मीडिया द्वारा गढ़ी गई नकारात्मक चर्चा करार दिया है। उन्होंने दो टूक कहा कि निशांत कुमार राजनीति में आएंगे या नहीं, इसका निर्णय केवल नीतीश कुमार ही करेंगे। ललन सिंह के इस बयान को उन नेताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है जो इस मुद्दे के बहाने अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं।

नीतीश की ‘समाजवादी छवि’ पर दांव
नीतीश कुमार सार्वजनिक मंचों से हमेशा लालू परिवार पर ‘परिवारवाद’ को लेकर हमलावर रहे हैं। वे अक्सर कहते हैं, “हमने अपने परिवार के लिए कुछ नहीं किया, मेरा परिवार बिहार की जनता है।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नीतीश कुमार को ‘असली समाजवादी’ बताते हुए उनकी तारीफ की थी कि उन्होंने कभी अपने परिवार को आगे नहीं बढ़ाया।

राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क:

छवि का संकट: यदि नीतीश कुमार अपने बेटे को राजनीति में लाते हैं, तो उनकी दशकों पुरानी ‘समाजवादी और परिवारवाद विरोधी’ छवि को गहरा धक्का लगेगा।

विपक्ष को मौका: 2025 के चुनाव में नीतीश कुमार किस मुंह से लालू परिवार के परिवारवाद पर सवाल उठाएंगे?

ऐसे में यह स्पष्ट है कि जहाँ एक वर्ग अपनी राजनीति चमकाने के लिए ‘निशांत राग’ अलाप रहा है, वहीं नीतीश कुमार अपनी साख बचाने के लिए इस मुद्दे पर पूरी तरह मौन और सतर्क हैं।

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