हर दिन हम जो नोट इस्तेमाल करते हैं, उन पर महात्मा गांधी का चेहरा इतना परिचित हो चुका है कि हम सोचते भी नहीं कि क्या कभी कोई और था? लेकिन भारतीय मुद्रा की यह कहानी काफी दिलचस्प है—समय के साथ चेहरे बदले, प्रतीक बदले और इसके पीछे देश की बदलती सोच और इतिहास छिपा है।
ब्रिटिश काल में भारतीय नोट सत्ता के प्रतीक थे। उस दौर में नोटों पर ब्रिटिश राजाओं की तस्वीरें छपी जाती थीं। सबसे पहले किंग जॉर्ज पंचम (King George V) का चेहरा नोटों पर आया, फिर उनके बाद किंग जॉर्ज षष्ठम (King George VI) की तस्वीर वाले नोट जारी हुए। ये नोट ब्रिटेन में छपते थे और भारत में चलन में लाए जाते थे, जो उस समय की औपनिवेशिक सत्ता की स्पष्ट निशानी थे। 1947 में आजादी मिलने के बाद भारत के सामने बड़ा सवाल था—क्या नए नोटों पर किसी व्यक्ति की तस्वीर हो? सरकार ने फैसला किया कि नोटों पर कोई व्यक्तिगत चेहरा नहीं होगा। इसका मकसद था कि नई मुद्रा किसी एक शख्स से नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की भावना और प्रतीकों से जुड़ी रहे। इसलिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने नोटों पर अशोक स्तंभ के सिंह चिह्न (Lion Capital of Ashoka) को मुख्य जगह दी। साथ ही खेती-किसानी, उद्योग, विज्ञान, संस्कृति और विकास से जुड़े चित्रों को प्रमुखता दी गई। इस दौर में कोई मानव चित्र नहीं था कि सिर्फ राष्ट्रीय प्रतीक और थीम आधारित डिजाइन।
महात्मा गांधी का चेहरा पहली बार 1969 में नोट पर आया कि यह उनकी जन्म शताब्दी का मौका था। उस समय जारी एक स्मारक नोट (commemorative note) पर गांधीजी बैठे हुए दिखते हैं, पीछे सेवाग्राम आश्रम की तस्वीर। लेकिन यह नियमित मुद्रा नहीं थी, सिर्फ विशेष उद्देश्य के लिए। फिर 1987 में जब 500 रुपये का नोट दोबारा शुरू किया गया, तो उस पर महात्मा गांधी की मुस्कुराती हुई तस्वीर लगाई गई। असली बड़ा बदलाव 1996 में आया, जब RBI ने महात्मा गांधी सीरीज लॉन्च की। इसके बाद से लगभग सभी नोटों (5 से 2000 रुपये तक) पर गांधीजी का चेहरा अनिवार्य हो गया।
इस फैसले के पीछे कई ठोस वजहें थीं:
1) गांधीजी आजादी की लड़ाई के सबसे बड़े प्रतीक हैं।
2) दुनिया भर में वे अहिंसा, शांति और सत्य के प्रतीक माने जाते हैं।
3) उनकी छवि राजनीतिक विवादों से ऊपर है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुरंत पहचानी जाती है।
4) एक ही चेहरे से नोटों में एकरूपता बनी रहती है, जो सुरक्षा फीचर्स के लिए भी फायदेमंद है।