अगर पति करता है हर बात पर शक, तो क्या पत्नी मांग सकती है तलाक? सुप्रीम कोर्ट के फैसले से समझिए…

Ritu Raj

भारत में वैवाहिक विवादों के बढ़ते मामलों के बीच, पति के बिना आधार के लगातार शक करना भी अब मानसिक क्रूरता माना जा रहा है, जो तलाक का मजबूत आधार बन सकता है। हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने एक ऐसे ही मामले में पत्नी को तलाक देते हुए कहा कि पति का बेवजह शक वैवाहिक जीवन को ‘नर्क’ बना देता है और पत्नी को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। अगर आपका पति हर कदम पर नजर रखता है,बेवफाई के आरोप लगाता है या आपकी आजादी छीनता है, तो कानून आपकी पीठ थपथपा सकता है। आइए, इस फैसले और कानूनी प्रावधानों को विस्तार से समझें।

हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने कोट्टायम जिले के एक मामले में पत्नी की अपील पर फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटते हुए तलाक की अनुमति दी है। जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस एम.बी. स्नेहलता की डिवीजन बेंच ने कहा कि एक शक्की पति वैवाहिक जीवन को नर्क बना सकता है, और पत्नी को गरिमा के साथ जीने का हक है। यह फैसला इंडियन डिवोर्स एक्ट, 1869 की धारा 10(1)(x) के तहत आता है, जो ईसाई दंपतियों पर लागू होता है, लेकिन इसका सिद्धांत सभी वैवाहिक कानूनों के लिए प्रासंगिक है। यह मामला केरल के कोट्टायम का है। जहां 2013 में एक ईसाई दंपति की शादी हुई, इससे एक बेटी भी है, जो अब 10 साल की हो चुकी है। पत्नी, जो एक स्टाफ नर्स थी, उन्होंने कोर्ट में बताया कि शादी के शुरुआती दिनों से ही पति का शक भरा व्यवहार शुरू हो गया। वह किसी भी पुरुष से बात करने पर बुरा मान लेता, बेवफाई के आरोप लगाता और उसकी हर गतिविधि पर नजर रखता। शक के चलते पति ने उसे नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जिससे पत्नी की आर्थिक स्वतंत्रता छिन गई। वहीं, पत्नी ने आगे खुलासा किया कि जब वह पति के साथ विदेश गई, तो उसका व्यवहार और बिगड़ गया। वह अक्सर उसे कमरे में बंद कर देता, फोन पर किसी से बात करने की इजाजत नहीं देता और कई बार शारीरिक मारपीट भी करता। इस सब से पत्नी को गहरा मानसिक तनाव हुआ, और वह डॉक्टर के पास भी गई। पत्नी ने फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की, लेकिन कोर्ट ने सबूतों की कमी का हवाला देकर याचिका खारिज कर दी। दूसरी तरफ, पति ने पत्नी के सभी आरोपों को झूठा बताते हुए कहा कि वह अदालत में बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है। उसने दावा किया कि कोई क्रूरता नहीं हुई, और शक का कोई आधार था। लेकिन हाईकोर्ट ने पत्नी की गवाही को विश्वसनीय माना, क्योंकि मानसिक क्रूरता के मामलों में हमेशा दस्तावेजी सबूत उपलब्ध नहीं होते। कोर्ट ने कहा, “पत्नी को ऐसी स्थिति में कोई स्वतंत्र सबूत पेश करने की उम्मीद नहीं की जा सकती, और अदालतें उसके केस को हल्के में नकार नहीं सकतीं।”

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हाईकोर्ट का तर्क: शक वैवाहिक विश्वास का जहर, तलाक का वैध आधार
अक्टूबर 2025 में सुनाए गए इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना किसी कारण के पत्नी पर शक करना, उसकी गतिविधियों की निगरानी करना, ईमानदारी पर सवाल उठाना और आजादी में हस्तक्षेप करना गंभीर मानसिक क्रूरता है। कोर्ट ने कहा: “लगातार अविश्वास का माहौल अपमान, डर और भावनात्मक पीड़ा पैदा करता है। ऐसी स्थिति में पत्नी से साथ रहने की उम्मीद करना अनुचित है। वह तलाक के माध्यम से गरिमा और आजादी के साथ जीने की हकदार है।” वहीं, कोर्ट ने जोर देते हुए कहा कि स्वस्थ शादी विश्वास, प्यार और समझ पर टिकी होती है। शक इसकी नींव को जहरीला कर देता है, और एक शक्की पति वैवाहिक जीवन को असहनीय बना देता है।

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