झारखंड के ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन: पिता की हत्या ने बदली थी जिंदगी, 11 बार के सांसद और तीन बार के मुख्यमंत्री बनने का सफर

Deepak Sharma

सिटी पोस्ट लाइव
शिबू सोरेन, जिन्हें झारखंड में दिशोम गुरु के नाम से जाना जाता है, का जीवन संघर्ष और दृढ़ संकल्प की एक मिसाल है। 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ के नेमरा गांव में एक शिक्षक के घर जन्मे शिबू सोरेन के जीवन ने तब एक नया मोड़ लिया जब उनके पिता, सोबरन मांझी, की निर्मम हत्या कर दी गई। हॉस्टल में पढ़ाई कर रहे शिबू पर इस घटना का गहरा असर पड़ा और यहीं से उनके सामाजिक और राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। पिता की हत्या के बाद पढ़ाई छोड़कर उन्होंने महाजनों के शोषण के खिलाफ आदिवासियों को एकजुट करने का बीड़ा उठाया।

शुरुआती दौर में शिबू सोरेन ने पारसनाथ की पहाड़ियों के आसपास के गांवों में ठिकाना बनाकर आदिवासियों को संगठित किया। उन्होंने धनकटनी आंदोलन चलाया, जिसमें सूदखोर महाजनों की फसलें काटकर आदिवासियों में बांट दी जाती थीं। इस आंदोलन ने उन्हें आदिवासियों के बीच एक कद्दावर नेता के रूप में स्थापित किया और उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि मिली।

पुश नोटिफिकेशन के लिए सब्सक्राइब करें।

शिबू सोरेन के राजनीतिक करियर की शुरुआत भले ही मुखिया और विधानसभा चुनावों में हार से हुई हो, लेकिन 1980 के लोकसभा चुनाव में दुमका सीट से जीत ने उनके लिए नई राहें खोलीं। इस चुनाव में उन्होंने दिशोम दाड़ी चंदा अभियान के तहत हर परिवार से एक पाव चावल और तीन रुपए चंदा जुटाकर चुनाव लड़ा। दुमका से उन्होंने कुल 8 बार लोकसभा चुनाव जीतकर एक कीर्तिमान स्थापित किया। वे तीन बार राज्यसभा सांसद भी रहे और केंद्र सरकार में मंत्री पद भी संभाला।

झारखंड राज्य के गठन के बाद शिबू सोरेन ने तीन बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन उनका कार्यकाल काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। 2005 में पहली बार सीएम बनने के बाद शशिनाथ हत्याकांड में नाम आने से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि, बाद में वे दोषमुक्त हुए। 2008 में दूसरी और 2009 में तीसरी बार भी वे मुख्यमंत्री बने, लेकिन कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। आज उनके बेटे हेमंत सोरेन राज्य की बागडोर संभाल रहे हैं। शिबू सोरेन का जीवन संघर्ष, आंदोलन और राजनीति का एक ऐसा सफर है जो झारखंड के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।

Share This Article