लालू यादव का ‘चारा’ चक्रव्यूह: 1996 से 2025 तक चली जांच, दो CBI चीफ की मौत, और अनगिनत अफसरों ने दांव पर लगा दिया करियर

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को कई बार जेल भेजने वाला बहुचर्चित चारा घोटाला सिर्फ एक वित्तीय अपराध नहीं है, बल्कि यह देश की सबसे लंबी और सबसे जटिल जांचों में से एक रहा है। ₹950 करोड़ (जो आज के हिसाब से ₹48 अरब से अधिक) के इस महाघोटाले को साबित करने के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के कई अधिकारियों ने अपने करियर और व्यक्तिगत जीवन को दांव पर लगा दिया। 1996 से शुरू हुई इस जांच ने कई जांच अधिकारियों और सीबीआई निदेशकों को देखा, जिनमें से कुछ की जांच पूरी किए बिना ही मौत हो गई, तो कई रिटायर हो चुके हैं।

950 करोड़ की ‘कागजी लूट’ की कहानी
1990 के दशक का यह घोटाला तब सामने आया जब पशुपालन विभाग में गायों और भैंसों के चारे के नाम पर सरकारी खजाने से बड़े पैमाने पर अवैध निकासी की गई। फर्जी बिल, नकली सप्लायर और जाली दस्तावेज बनाए गए। जांच में पता चला कि बिलों में दिखाया गया कि हरियाणा से गायों को स्कूटर पर लाया गया और चारा हेलीकॉप्टर से गिराया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव पर घोटाले के केंद्र में होने का आरोप लगा।

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कहानी की शुरुआत 1995 में हुई, जब रांची के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर अमित खरे (वर्तमान में पीएमओ में तैनात) को खजाने से अजीबोगरीब निकासी के कागजात दिखे। उनकी रिपोर्ट पर जिला मजिस्ट्रेट वी.एस. दुबे ने सीबीआई को पत्र लिखा और जनवरी 1996 में सीबीआई का छापा पड़ा।

लालू यादव पर चला कानूनी शिकंजा
मार्च 1996 में पटना हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी। सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर उपेंद्र नाथ बिस्वास (यू.एन. बिस्वास) ने बिना किसी डर के तहकीकात की। मई 1997 में सीबीआई ने बिहार के राज्यपाल को पत्र लिखकर लालू यादव पर मुकदमा चलाने की इजाजत मांगी।

जुलाई 1997 में लालू यादव को सीबीआई कोर्ट में सरेंडर करना पड़ा और जनता दल के दबाव में उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। उन्होंने राजनीतिक चाल चलते हुए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। 1997 में सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल की, जिसमें लालू और 55 अन्य लोगों के खिलाफ आरोप तय हुए। यह घोटाला 53 मामलों में बंटा, जिसमें 500 से अधिक आरोपी शामिल थे।

CBI जांच का सफर: 13 डायरेक्टर, 2 की मौत
1996 में चारा घोटाला सामने आने के बाद से दिसंबर 2025 तक, सीबीआई में कुल 13 डायरेक्टर बने जिन्होंने किसी न किसी स्तर पर इस केस की जांच, चार्जशीट और सजा की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

निधन हुए CBI डायरेक्टर: इन 13 निदेशकों में से अब तक दो की मौत हो चुकी है:

  1. जोगिंदर सिंह: वह जुलाई 1997 से मार्च 1998 तक सीबीआई डायरेक्टर रहे। उनके कार्यकाल में ही लालू यादव को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था। साल 2017 में उनका निधन हो गया।
  2. रंजीत सिन्हा: वह दिसंबर 2012 से मई 2015 तक सीबीआई डायरेक्टर रहे। उनके कार्यकाल में ही 2013 में लालू यादव को चारा घोटाले के पहले मामले में सजा हुई थी। साल 2024 में उनका निधन हो गया।

रिटायर हुए/सेवारत अधिकारी: इन दो दिवंगत निदेशकों के अलावा, शेष 11 सीबीआई डायरेक्टर (जिनमें एम. नारायणन, आर के राघवन, अश्विनी कुमार, ए.पी. सिंह, अनिल कुमार सिन्हा, आलोक वर्मा, ऋषि कुमार शुक्ला आदि शामिल हैं) या तो रिटायर हो चुके हैं या अन्य पदों पर कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त, सीबीआई के सूत्रों के अनुसार, इस लंबी जांच में जुटे लगभग एक दर्जन जांच अधिकारियों (IOs) की भी मौत हो चुकी है या वे सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

लालू पर 50 साल से अधिक की सजा
चारा घोटाले से जुड़े पाँच अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराए गए लालू यादव को, जिन्होंने 2013 में चाईबासा ट्रेजरी से ₹37.7 करोड़ के गबन पर पहली बार 5 साल की कैद की सजा पाई, उसके बाद 2017-2018 में देवघर कोषागार से ₹89 करोड़ निकालने पर 3.5 साल, चाईबासा (दूसरे केस) से ₹33 करोड़ निकालने पर 5 साल, दुमका कोषागार से ₹139 करोड़ निकालने पर 5 साल और 2022 में डोरंडा कोषागार से ₹139 करोड़ निकालने पर 5 साल की सजा मिली है, जिसके फलस्वरूप उन्हें कुल मिलाकर 50 साल से अधिक की जेल की सजा सुनाई जा चुकी है, हालांकि वह जमानतों और अपीलों के माध्यम से बाहर हैं।

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