सिटी पोस्ट लाइव
बिहार में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव की घोषणा भले ही न हुई हो, लेकिन राजनीतिक सरगर्मी तेज हो चुकी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही अपनी-अपनी रणनीति और शक्ति प्रदर्शन में जुटे हैं। लेकिन चुनावी मौसम में एक बार फिर चर्चा 2020 के उस विधानसभा चुनाव की हो रही है, जिसने बिहार को देश का सबसे रोमांचक चुनाव दिखाया था। उस चुनाव में कई सीटों पर हार-जीत का अंतर हजारों में नहीं, बल्कि सैकड़ों और दहाई के अंकों तक सिमट गया था, जिसने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव जैसे बड़े नेताओं तक की धड़कनें बढ़ा दी थीं।
हिलसा सीट का वो 12 वोटों का रोमांच
2020 के चुनाव में सबसे बड़ा उदाहरण हिलसा विधानसभा सीट रही, जहां जदयू के उम्मीदवार कृष्ण मुरारी शरण ने राजद के शक्ति सिंह यादव को महज 12 वोटों से हराया था। इस नतीजे को लेकर उस समय जमकर विवाद हुआ था और धांधली के आरोप भी लगे थे। यह मुकाबला इतना कड़ा था कि पूरे राज्य में इसकी चर्चा हुई थी।
2020 के चुनाव में करीबी मुकाबले
पांच साल पहले हुए उस चुनाव में करीब तीन दर्जन विधानसभा सीटें ऐसी थीं, जहां जीत का अंतर 3000 से भी कम वोटों का था। इन सीटों में से 17 पर महागठबंधन ने जीत हासिल की, जबकि 19 सीटें एनडीए के खाते में गईं और एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार को मिली।
महागठबंधन की करीबी जीत: सिमरी बख्तियारपुर (राजद) में 1759 वोटों से जीत, डेहरी आन सोन (राजद) में 464 वोटों से जीत, बखरी (भाकपा) में 777 वोटों से जीत और सीवान (राजद) में 1973 वोटों से जीत शामिल थी। इसके अलावा, दरभंगा ग्रामीण, किशनगंज और खगड़िया जैसी सीटों पर भी जीत का अंतर 2000 से कम था।
एनडीए की नजदीकी जीत: एनडीए के लिए भी मुकाबला आसान नहीं था। बरबीघा में जदयू के सुदर्शन कुमार ने 113 वोटों से जीत हासिल की, जो सबसे करीबी मुकाबलों में से एक था। इसके अलावा, भोरे में जदयू के सुनील कुमार 462 वोटों से, बछवाड़ा में भाजपा के सुरेश मेहता 484 वोटों से और सकरा में जदयू के अशोक चौधरी 1537 वोटों से जीते थे।
बदले हुए समीकरण, क्या फिर होगा रोमांच?
2020 के चुनाव ने यह साबित कर दिया था कि बिहार में एक-एक वोट की कीमत कितनी है। इस बार राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। गठबंधन में बदलाव आया है, कई नेता पाला बदल चुके हैं और जनता के मुद्दे भी बदल रहे हैं।
सवाल यह है कि क्या 2025 के चुनाव में भी वैसे ही बेहद करीबी मुकाबले देखने को मिलेंगे? या फिर इस बार मतदाता किसी एक पक्ष को स्पष्ट जनादेश देंगे? 2020 की जीत-हार के मामूली फासले ने नेताओं की बेचैनी बढ़ा दी है और अब हर कोई यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि उनकी जीत का अंतर सिर्फ 12 वोटों का न रह जाए।