RJD की बैशाखी छोड़ अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है कांग्रेस, जानिये राहुल की रणनीति.

Manisha Kumari

सिटी पोस्ट लाइव :कांग्रेस नेता राहुल गांधी पिछले 4 महीने में चारबार बिहार आ चुके हैं.बिहार  कांग्रेस ने 15 मई को पूरे प्रदेश में 75 दलित छात्रावासों में जाकर छात्रों से संवाद करने का कार्यक्रम बनाया.राहुल गांधी दरभंगा पहुंचे .उसी दिन कांग्रेस ने अपने नेताओं को बिहार के हर जिले में उतार दिया था.दरभंगा में राहुल गांधी को कार्यक्रम करने की इजाजत नहीं मिली.फिर भी वो अम्बेडकर छात्रावास पहुंचे.दलित छात्रों के साथ संवाद किया.कांग्रेस के नेताओं को  कई जगह कार्यक्रम करने की इजाजत नहीं मिली. इसके बाद भी कांग्रेस 45 से अधिक जगह पर कार्यक्रम करने में सफल रही.राहुल ने पटना लौटकर इसी वर्ग के लोगों के साथ फिल्म फुले भी देखी थी. कांग्रेस यह कोशिश चुनावी साल में कर रही है.

राहुल ने दरभंगा में नरेंद्र मोदी सरकार पर देश की 90 फीसदी आबादी के खिलाफ होने का आरोप लगाया है. 90 फीसदी की बात कर राहुल पिछड़ों, अतिपिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को अपने पाल में करने की बात कर रहे थे. यह वही वर्ग है, जिसके कांग्रेस से दूर होने की वजह कांग्रेस बिहार की सत्ता से दूर है. उसे राजद की बैशाखी के सहारे बिहार में राजनीति करनी पड़ रही है. कांग्रेस अब इस स्थिति को तोड़कर अपने पैर पर खड़ा होना चाहती है, इसी कोशिश में वह पिछड़ों खासकर अतिपिछड़ों को अपनी ओर करने की कोशिश कर रही है. इस अति पिछड़ा वर्ग की बिहार में आबादी 36 फीसदी से अधिक की है.

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बिहार में कर्पूरी ठाकुर ईबीसी के सबसे बड़े नेता रहे. वो बिहार में एक बार उपमुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे. देश में पिछड़े वर्गों के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने से बहुत पहले ही कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में पिछड़ों को आरक्षण देने की पहल की थी. मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने 1971 में मुंगेरीलाल आयोग का गठन किया था. इस आयोग का काम बिहार में पिछड़ों के आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक हालात का आकलन करना था. इस आयोग ने 1976 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. उस समय राज्य में जगन्नाथ मिश्र के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी. कांग्रेस सरकार आयोग की रिपोर्ट पर कुंडली मार कर बैठ गई थी.

 मुंगेरीलाल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बिहार में 128 जातियों को आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और नौकरी के मामले में पिछड़ा पाया था. इन 128 जातियों को दो वर्गों में बांटा गया था. 34 जातियों को पिछड़े वर्ग में रखा गया तो 94 जातियों को अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) की श्रेणी में.कर्पूरी ठाकुर जब 1977 में दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अक्तूबर 1978 में मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिशें लागू करने की घोषणा की. इस आयोग ने पिछड़ा वर्ग के लिए आठ फीसदी और अति पिछड़ा वर्ग के लिए 12 फीसदी, हर जाति वर्ग की महिलाओं के लिए तीन फीसदी और आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों के तीन फीसदी आरक्षण की सिफारिश की थी.हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक आधार पर आरक्षण को बाद में असंवैधानिक घोषित कर दिया था.

 कर्पूरी ठाकुर की इस पहल ने बिहार के अति पिछड़ों में राजनीतिक चेतना का संचार किया और एक नए वोट बैंक को जन्म दिया.बिहार की नीतीश कुमार सरकार के जातीय सर्वेक्षण में 112 जातियों को अति पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में रखा गया. इन 112 जातियों में से केवल तेली, मल्लाह, कानू और धानुक ही ऐसी जातियां हैं, जिनकी आबादी दो फीसदी या उससे अधिक है. वहीं अति पिछड़ा मुस्लिम जातियों में केवल जुलाहों की आबादी ही 3.5 फीसदी से अधिक है. इसके अलावा नोनिया, चंद्रवंशी, नाई, बढ़ई, मुस्लिम धुनिया और मुस्लिम कुंजड़ा की ही आबादी दो फीसदी से कम है. इन 12 जातियों को छोड़कर बाकी की 100 अति पिछड़ी जातियों की आबादी 1 फीसदी या उससे कम है. ये वहीं जातियां हैं, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे पिछड़ी हैं.   

नीतीश कुमार 2005 से बिहार के सीएम की कुर्सी पर काबिज हैं. वो कुर्मी जाति से हैं, जिसकी बिहार में आबादी 2.87 फीसदी है. मतलब कुर्मी की आबाद जुलाहों से भी कम है. लेकिन एक 1995 की कुर्मी चेतना रैली को छोड़ दें तो नीतीश ने कभी भी कुर्मी नेता बनने की कोशिश नहीं की. ऐसा तब था जब उनके प्रतिद्वंदी लालू प्रसाद यादव अपना मुसलमान-यादव (एमवाई) समीकरण बनाकर घूम रहे थे. नीतीश ने इसी ईसीबी पर ध्यान देना शुरू किया. उन्होंने इन जातियों तक अपनी सरकार की योजनाओं की पहुंच सुनिश्चित किया. उन्होंने मुंगेरीलाल से आगे बढ़कर ईबीसी में और जातियों को जोड़ा. इससे इनकी संख्या 94 से बढ़कर 112 हो गई.

इस ईबीसी वोट बैंक पर नीतीश कुमार की सहयोगी बीजेपी की भी नजर है. इसलिए उसने 2024 में कर्पूरी ठाकुर की 100वीं जयंती से ठीक एक दिन पहले उन्हें भारत का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ देने की घोषणा की थी. बिहार की राजनीति अब भी जाति के आधार पर ही हो रही है. लेकिन इस राजनीति के पुराने प्लेयर अब पिछड़ते हुए नजर आ रहे हैं. नीतीश कुमार के खराब स्वास्थ्य की वजह से अब जेडीयू को कमजोर बताया जा रहा है. पिछले विधानसभा चुनाव में वह बीजेपी से काफी पिछड़ गई. वहीं लालू यादव की आरजेडी अभी भी बिहार की सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन सरकार बनाने लायक बहुमत वह नहीं जुटा पा रही है. इस बीच अब तक जूनियर टीम बन कर राजनीति कर रहीं बीजेपी और कांग्रेस की महत्वाकांक्षा जागने लगी है.हिंदुत्व की राजनीति करने वाली बीजेपी भी जाति की राजनीति में उतरी हुई है तो धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाली कांग्रेस जातियों को एकजटु कर रही है.

बिहार में कांग्रेस की सहयोगी आरजेडी के पास अपना एम-वाई समीकरण है, जो कि ईबीसी के बाद सबसे बड़ा वोट बैंक है. वहीं कांग्रेस अब दलित और ईबीसी को जोड़कर अपना वोट बैंक बनाने की कोशिश कर रही है. इसी कोशिश में उसने अपना प्रदेश अध्यक्ष दलित को बनाया है और ईबीसी के भूले-बिसरे नेताओं को याद कर उन जातियों को अपनी ओर करने की कोशिश कर रही है. इसी साधने के लिए राहुल गांधी अप्रैल में भी बिहार गए थे. वहां उन्होंने ईबीसी जातियों के नेताओं एक कार्यक्रम में याद किया था.

 राहुल गांधी पिछले कुछ सालों से जाति जनगणना की मांग कर रहे हैं. नरेंद्र मोदी सरकार ने भी कहा है कि अगली जनगणना में जातियों की भी गणना की जाएगी. राहुल गांधी इसे अपनी जीत बता रहे हैं. यह वही कांग्रेस है, जो 2010 तक जाति जनगणना का विरोध कर रही थी. अब यह समय ही बताएगा कि इस बदली हुई रणनीति का फायदा कांग्रेस और राहुल गांधी को कितना मिलता है.

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