नीतीश कुमार ने संसद में कह दिया सच, 28 साल बाद भी गूंज रहा राजनीतिक संदेश…

Ritu Raj

भारतीय संसद के इतिहास में कुछ भाषण ऐसे होते हैं जो समय की दीवारें तोड़ देते हैं। वे सिर्फ उस दिन की बहस नहीं रहते, बल्कि दशकों बाद भी राजनीति को आईना दिखाते हैं। 30 अप्रैल 1997 को लोकसभा में नीतीश कुमार का दिया गया भाषण भी कुछ ऐसा ही था—सत्ता, नैतिकता और लोकतंत्र के रिश्ते पर एक सीधा, बेबाक और चुनौती भरा सवाल।

आज, पूरे 28 साल बाद, वही भाषण फिर चर्चा में है। वजह सिर्फ सोशल मीडिया पर उसका वायरल होना नहीं है, बल्कि वे सवाल हैं जो तब भी भारतीय राजनीति के सामने थे और आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। बिहार की मौजूदा सियासत में यह बहस इसलिए और तेज हो गई है क्योंकि 9 जनवरी को आईआरसीटीसी घोटाले में लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को एक बार फिर अदालत का सामना करना है। लालू यादव पहले ही चारा घोटाले में सजायाफ्ता हैं और स्वास्थ्य कारणों से जमानत पर बाहर हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक सक्रियता आज भी बहस और सवालों को जन्म देती है। दरअसल, 30 अप्रैल 1997 का वह दिन सामान्य नहीं था। लोकसभा में रेलवे बजट पर चर्चा चल रही थी। माहौल रूटीन था, लेकिन तभी समता पार्टी के सांसद नीतीश कुमार खड़े हुए और बहस की दिशा ही बदल दी। बजट के आंकड़ों से हटकर उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, सत्ता की जवाबदेही और नैतिकता को केंद्र में ला दिया। उस समय बिहार में लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे और चारा घोटाले में सीबीआई की जांच निर्णायक मोड़ पर थी। चार्जशीट दाखिल होने की तैयारी थी और सियासी पारा चढ़ा हुआ था।

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नीतीश कुमार ने संसद के भीतर साफ शब्दों में कहा—लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं हो सकता। अगर किसी जनप्रतिनिधि पर गंभीर आरोप हैं और जांच एजेंसी के पास चार्जशीट दाखिल करने लायक सबूत हैं, तो उसे पद छोड़कर अदालत में जाकर अपनी बेगुनाही साबित करनी चाहिए। सत्ता से चिपके रहना लोकतंत्र का अपमान है। यह बयान सिर्फ किसी एक व्यक्ति पर हमला नहीं था, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति पर सीधी चोट थी, जहां पद और ताकत को ढाल बना लिया जाता है। उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं ने शायद कभी यह कल्पना नहीं की होगी कि कोई मुख्यमंत्री बड़े घोटाले में फंसकर भी कुर्सी से चिपका रहेगा। नीतीश कुमार ने दोहरे मापदंड की राजनीति पर भी तीखा वार किया। हवाला कांड का जिक्र करते हुए उन्होंने शरद यादव, माधवराव सिंधिया, वी.सी. शुक्ला और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं का उदाहरण दिया—जिन्होंने सिर्फ डायरी में नाम आने पर नैतिकता के आधार पर अपने पद छोड़े थे। सवाल सीधा था: क्या कुछ नेताओं के लिए नियम अलग हैं और बाकी के लिए अलग?

हालांकि, भाषण का सबसे असरदार हिस्सा वह था, जहां नीतीश कुमार ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा—अगर नेता खुद को संविधान से ऊपर समझने लगेंगे, तो जनता सड़कों पर उतरकर लोकतंत्र की रक्षा करेगी। उन्होंने पटना में समता पार्टी कार्यकर्ताओं पर हुए लाठीचार्ज का जिक्र करते हुए कहा, “हम लाठी खाने को तैयार हैं, गोली खाने को तैयार हैं, लेकिन लोकतंत्र को बचाएंगे।” यह पंक्ति सदन में गूंज उठी और माहौल गंभीर हो गया। सदन में प्रतिक्रियाएं मिली-जुली थीं। कुछ सांसदों ने उनके तर्कों का समर्थन किया, तो कुछ ने सीबीआई की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। लेकिन एक बात साफ थी—नीतीश कुमार ने बहस को सत्ता की सुविधा से निकालकर नैतिकता और जवाबदेही के कठोर धरातल पर ला खड़ा किया था। उनका गंवई लहजा, सीधी भाषा और साफ संदेश इस भाषण को और प्रभावशाली बना रहे थे।

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