राहुल गांधी का चुनावी तूफ़ान- NDA के गढ़ में सेंध लगाने की तैयारी!…

Ritu Raj

बिहार की सियासत में राहुल गांधी ने एक बार फिर अपनी सक्रियता से हलचल मचा दी है। बेगूसराय के तालाब में मछली पकड़ने के लिए उतरना सिर्फ एक प्रतीकात्मक कदम नहीं, बल्कि मछुआरा और निषाद समुदाय को साधने की कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। मतदाता अधिकार यात्रा के बाद अब राहुल ने ‘मल्लाह राजनीति’ के जरिए नए सामाजिक समीकरण साधने का संकेत दिया है। उनके साथ वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी की मौजूदगी ने इस सियासी संदेश को और मजबूत कर दिया।

राहुल गांधी का यह कदम कांग्रेस के लिए एक नए जनसंपर्क अभियान की तरह देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मछुआरा और निषाद समुदाय के बीच जाकर राहुल गांधी ने भावनात्मक जुड़ाव और सम्मान का संदेश देने की कोशिश की है। वहीं, कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि “मतदाता अधिकार यात्रा” के बाद यह कार्यक्रम पार्टी की रणनीति का अगला चरण है, जिसका उद्देश्य जातीय और सामाजिक आधार पर बिखरे समुदायों को कांग्रेस के पक्ष में लामबंद करना है। राहुल गांधी के साथ मंच पर वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी की मौजूदगी इस अभियान को और अधिक राजनीतिक वजन देती है। सहनी, जो कभी एनडीए का हिस्सा रहे हैं, अब महागठबंधन के सहयोगी हैं। माना जा रहा है कि उनके जुड़ने से मल्लाह और निषाद समुदाय में महागठबंधन के प्रति भरोसा बढ़ सकता है। वहीं, बीजेपी ने इस पहल को ‘चुनावी नौटंकी’ करार देते हुए राहुल गांधी पर पलटवार किया है। पार्टी नेताओं ने तंज कसते हुए कहा कि राहुल गांधी वही कर रहे हैं, जिसे उन्होंने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने पर ‘ड्रामा’ कहा था। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि राहुल गांधी का यह जनसंपर्क अभियान “जनता के बीच सीधा संवाद” स्थापित करने का प्रयास है, न कि दिखावा। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि यदि राहुल का यह भावनात्मक जुड़ाव वोट में तब्दील हुआ, तो बिहार की 40 से 50 विधानसभा सीटों पर इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है।

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राहुल गांधी की बेगूसराय झील में डाली गई यह “राजनीतिक छलांग” अब केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि आने वाले दिनों की सियासी दिशा तय करने वाला संकेत बन गई है। बिहार की राजनीति में जहां जातीय समीकरण और भावनात्मक जुड़ाव दोनों अहम भूमिका निभाते हैं, वहीं जनता अब वादों से आगे ठोस बदलाव चाहती है। आने वाले हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि राहुल गांधी का यह नया जनसंपर्क अभियान महागठबंधन को ऊर्जा देता है या केवल सुर्खियों तक सीमित रह जाता है।

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