सिटी पोस्ट लाइव
बिहार की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव जिस तरह से जन सरोकार के मुद्दों पर मुखर हो रहे हैं, उसने राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी राजद (RJD) और उसके नेता तेजस्वी यादव की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि संघर्ष और जमीन पर उपस्थिति के मामले में पप्पू यादव ने तेजस्वी यादव को काफी पीछे छोड़ दिया है।
नीट छात्रा की मौत और पप्पू यादव का संघर्ष
पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में नीट (NEET) की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला हो या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना, पप्पू यादव हर जगह खुद मोर्चा संभालते नजर आए। उन्होंने न केवल इस घटना की तह तक जाने के लिए भाग-दौड़ की, बल्कि अस्पताल से लेकर हॉस्टल तक जाकर सबूत जुटाने की कोशिश की। उनके इसी तेवर ने उन्हें आम जनता के बीच एक ‘जननायक’ के रूप में स्थापित कर दिया है।
गिरफ्तारी बनी ‘राजनीतिक टॉनिक’
पप्पू यादव की हालिया गिरफ्तारी और रिहाई ने उनकी लोकप्रियता में चार चाँद लगा दिए हैं। भले ही यह एक कानूनी मसला हो, लेकिन इसकी टाइमिंग ने जनता के मन में सरकार के प्रति रोष और पप्पू के प्रति सहानुभूति पैदा कर दी है। खुद राहुल गांधी ने उन्हें अपना ‘साथी’ बताया और उनकी गिरफ्तारी को राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया। प्रियंका गांधी का उन्हें फोन करना और राहुल गांधी द्वारा उन्हें ‘न्याय की आवाज’ कहना, बिहार कांग्रेस के भीतर उनकी बढ़ती अहमियत को दर्शाता है।
बयानबाजी बनाम जमीनी आंदोलन: तेजस्वी पीछे छूटे?
विपक्ष के नेता होने के नाते तेजस्वी यादव ने भी नीट छात्रा की मौत का मुद्दा उठाया, लेकिन उनकी सक्रियता सोशल मीडिया और प्रेस बयानों तक ही सीमित रही। राजद की महिला इकाई ने प्रदर्शन जरूर किया, लेकिन तेजस्वी खुद सड़कों पर नजर नहीं आए। इसके विपरीत, पप्पू यादव ने इस मुद्दे को एक जन आंदोलन में बदल दिया। “पप्पू यादव की सबसे बड़ी ताकत उनकी लड़ने-भिड़ने की क्षमता है। दबंगई के आरोपों के बावजूद, मुसीबत में फंसे लोगों के लिए आधी रात को खड़े होने वाली उनकी छवि ने उन्हें लालू-नीतीश के विरोध के बावजूद 2024 में पूर्णिया से जीत दिलाई थी।”
बदलते राजनीतिक समीकरण
दिलचस्प बात यह है कि जिन तेजस्वी यादव के विरोध के कारण पप्पू यादव की राजद में एंट्री नहीं हो पाई थी, आज वही तेजस्वी और मनोज झा उनके समर्थन में बोलने को मजबूर हैं। राहुल गांधी का समर्थन मिलना यह संकेत देता है कि भविष्य में पप्पू यादव बिहार में कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन का मुख्य चेहरा बन सकते हैं। जनता के बीच बढ़ती सहानुभूति और राहुल-प्रियंका का हाथ, पप्पू यादव को बिहार की राजनीति का नया ध्रुव बना रहा है।