बिहार में सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के लचर क्रियान्वयन और राज्य सूचना आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर पटना हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग में लगभग 30,000 अपीलों के लंबित होने और सूचना तंत्र की विफलता को कोर्ट ने बेहद गंभीरता से लिया है।

PIL के माध्यम से व्यवस्थागत विफलता को दी गई चुनौती;
यह मामला अधिवक्ता प्रवीण कुमार द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से सामने आया है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील राजेश कुमार शर्मा ने कोर्ट के समक्ष बिहार की RTI व्यवस्था की बदहाली का खाका पेश किया। उन्होंने कई तर्क रखते हुए कहा कि सूचना प्राप्त करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों के जानने के अधिकार का अभिन्न अंग है, जिसका वर्तमान में उल्लंघन हो रहा है। अधिकारियों द्वारा सूचना देने में जानबूझकर देरी की जाती है, फिर भी दोषी लोक सूचना अधिकारियों (PIO) पर वैधानिक जुर्माना शायद ही कभी लगाया जाता है। हालांकि, सूचना के अधिकार का कमजोर होना शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही को सीधे तौर पर चोट पहुँचा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार;
सुनवाई के दौरान राज्य सूचना आयोग की ओर से पक्ष रखते हुए वरीय अधिवक्ता ललित किशोर ने कोर्ट को अवगत कराया कि ठीक इसी तरह का एक मामला वर्तमान में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट में इस विषय पर अगली सुनवाई 28 अप्रैल, 2026 को होनी तय है।

अगली सुनवाई 18 जून;
उच्चतम न्यायालय में लंबित मामले और इन गंभीर तथ्यों को देखते हुए, पटना हाईकोर्ट ने अपनी सुनवाई को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सूचना के अधिकार जैसे महत्वपूर्ण कानून को अधिकारियों की लापरवाही के कारण ‘मृत पत्र’ (Dead Letter) नहीं बनने दिया जा सकता। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने इस जनहित याचिका पर अगली सुनवाई के लिए 18 जून, 2026 की तिथि निर्धारित की है।