जमुई बुनियादी सुविधाओं को तरसते ग्रामीणों ने फूंका JDU विधायक का पुतला, किया वोट बहिष्कार का ऐलान

Deepak Sharma

सिटी पोस्ट लाइव
जमुई (झाझा), बिहार:
आगामी बिहार विधानसभा चुनाव से पहले, जमुई जिले के झाझा प्रखंड के बलियो गांव में मूलभूत सुविधाओं की कमी को लेकर ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है। ग्रामीणों ने झाझा विधानसभा क्षेत्र के जदयू विधायक दामोदर रावत का पुतला नदी में जलाकर अपना विरोध दर्ज कराया और आगामी चुनाव में वोट बहिष्कार की घोषणा की।

ग्रामीणों का आरोप है कि आजादी के 78 साल बाद भी बलियो और आसपास के दर्जनों गांव सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। झाझा शहर से इन गांवों को जोड़ने वाली सड़क की हालत बेहद जर्जर है, और नदी पर पुल का निर्माण आज तक नहीं हो सका है। बरसात के दिनों में नदी में उफान आने से इन गांवों का संपर्क पूरी तरह टूट जाता है, जिससे ग्रामीणों का जीवन दूभर हो जाता है।

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शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर गहरा संकट
नदी पर पुल न होने के कारण बरसात के मौसम में स्कूली बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है। बीमारों को झाझा अस्पताल तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है, कई बार तो गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए ले जाने में भी जान जोखिम में डालनी पड़ती है। हाल ही में एक घटना में डायल 112 की पुलिस गाड़ी भी नदी पार करते वक्त फंस गई थी, जो यह दर्शाता है कि आपातकालीन सेवाएं भी समय पर इन गांवों तक नहीं पहुंच पातीं।

खनन से और बिगड़ी स्थिति
ग्रामीणों ने बताया कि सरकार ने पुल तो नहीं बनाया, लेकिन नदी में बालू खनन की टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी है, जिससे नदी की गहराई और बढ़ गई है। इससे इस साल बरसात में और भी गंभीर समस्याएं उत्पन्न होने की आशंका है।

गांव के मुन्ना सिंह, राजकुमार यादव, साबिर खान, टिंकू शर्मा सहित कई लोगों ने विधायक के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। उन्होंने स्पष्ट कहा, “जब तक गांव में पुल और सड़क नहीं बनेगी, हम किसी को भी वोट नहीं देंगे – चाहे वो दामोदर रावत हों या कोई और।” उन्होंने आगे कहा, “हम लोग अब वोट नहीं देंगे। जब पुल नहीं बना, तो वोट का क्या मतलब? पहले पुल बनाओ, तब बात होगी। हम इस बार किसी को वोट नहीं देंगे।”

एक ओर सरकार अपनी योजनाओं और विकास कार्यों की उपलब्धियों का प्रचार कर रही है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण आज भी आधारभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर कब तक इन ग्रामीणों को ऐसे हालात में जीना पड़ेगा और क्या सरकार एवं जनप्रतिनिधि उनकी इस गंभीर आवाज़ को सुनेंगे?

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