सिटी पोस्ट लाइव
बिहार की राजनीति में मिथिलांचल हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। पटना तक पहुंचने का रास्ता मिथिलांचल से होकर ही गुजरता है’। कांग्रेस पार्टी के लिए यह इलाका लाइफ लाइन था। मिथिला में कांग्रेस का जनाधार इतना मजबूत था कि विधानसभा से लेकर लोकसभा तक की तस्वीर बदल जाया करती थी। अब जब महागठबंधन की ‘वोट अधिकार यात्रा’ 26 अगस्तको सुपौल में पहुंची तो नारा था-‘वोट चोर गद्दी छोड़’। सभा और जुलूस के दौरान एक दिलचस्प तस्वीरें सामने आईं। क्या है इसके मायने बात करने के लिए मेरे साथ हैं सिटी पोस्ट के संपादक ।
सुपौल में पुराने कांग्रेसियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में नए चेहरे भी कांग्रेस के झंडे थामे दिखे।मिथिलांचल का पारंपरिक धार्मिक पर्व चौरचनहोने के बावजूद कांग्रेस और राजद कार्यकर्ताओं का उत्साह कम नहीं हुआ। शहर का नजारा मानो 80 के दशक की याद दिला रहा था, जब हर गली-कूचे में सिर्फ हाथ छाप के झंडे लहराते थे। दशकों बाद कांग्रेस का वही पुराना जनाधार पुनर्जीवित होता दिखा।कांग्रेस के पुराने नेताओं की जगह अब नए चेहरे मैदान में दिख रहे हैं। खासकर युवाओं और महिलाओं की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि पार्टी का आधार फिर से मजबूत करने की कोशिश की जा रही है। यह अभी कहना जल्दबाजी होगी कि यह लहर चुनावी नतीजों में बदल पाएगी या नहीं। आरजेडी -कांग्रेस के बीच समीकरणों पर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है। जहां राजद का स्थानीय मैनेजमेंट मजबूत है, कांग्रेस भी अब अपने पुराने जनाधार को वापस पाने के लिए जोर आजमा रही है।
इस यात्रा की सबसे बड़ी खासियत रही प्रियंका गांधी की मौजूदगी। उनके भाषण और जुड़ाव ने कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया। लंबे समय से बिहार की राजनीति में कांग्रेस का ग्राफ गिरता रहा है, लेकिन प्रियंका की सक्रियता ने कांग्रेसियों को उम्मीद दी है कि शायद अब ‘डूबती नैया’ में नई हवा भर सके।लोगों के बीच चर्चा थी कि जिस तरह कभी मिथिलांचल में कहा जाता था-‘कतबो करब बाप-बाप, तयो जिततो हाथ छाप’। उसी जुनून की झलक फिर देखने को मिली।
यह यात्रा सुपौल शहर के हुसैन चौक से शुरू होकर मुख्य मार्गों से गुजरते हुए जिले की अंतिम सीमा मझारी तक पहुंची। आयोजन की पूरी जिम्मेदारी राजद के पास थी, लेकिन सड़कों पर कांग्रेस का दबदबा साफ दिखा। झंडे, पोस्टर और नारेबाजी में कांग्रेस का उत्साह राजद पर भारी पड़ा। इससे साफ है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं की सक्रियता में हाल के दिनों में काफी इजाफा हुआ है।
सुपौल जिले का बलुवा गांव तो लंबे समय तक राजनीतिक चर्चाओं में इस कदर हावी रहा कि लोग मजाक में इसे ‘मुख्यमंत्री की राजधानी’ कहने लगे।इसकी सबसे बड़ी वजह थी-बिहार के तीन बार मुख्यमंत्री रहे डॉ। जगन्नाथ मिश्र। वे बलुवा के ही निवासी थे और मिथिला की राजनीति में उनकी गहरी पकड़ थी। उनके नेतृत्व में कांग्रेस का आधार इतना मजबूत था कि बलुवा गांव सत्ता की राजनीति का केंद्र बन गया था।
मिथिलांचल की पहचान हमेशा से शिक्षित और राजनीतिक रूप से जागरूक क्षेत्र के रूप में रही है। 70 और 80 के दशक तक कांग्रेस यहां की सबसे ताकतवर राजनीतिक ताकत थी। ‘कतबो करब बाप-बाप, तइयो जिततो हाथ छाप’ जैसा मुहावरा यहीं से निकला था, जो कांग्रेस की पकड़ को साफ बताता है। सुपौल, मधेपुरा, मधुबनी और दरभंगा जैसे जिलों में कांग्रेस के झंडे हर गली-कूचे में दिखाई देते थे।डॉ। मिश्र को जनता ‘साधु बाबू’ के नाम से पुकारती थी। उनके नेतृत्व में मिथिला और खासकर सुपौल कांग्रेस की राजनीति का गढ़ बन गया। वे 1975, 1980 और 1989 में बिहार के मुख्यमंत्री बने। उनके कार्यकाल में मिथिलांचल को राजनीति, शिक्षा और प्रशासन में विशेष अहमियत मिली। सुपौल और बलुवा के लोग उस दौर में गर्व से कहते थे कि ‘हमारे गांव से निकलता है मुख्यमंत्री’।
90 के दशक में जब मंडल राजनीति और सामाजिक समीकरण बदले तो कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक टूटने लगा। राजद और अन्य दलों ने धीरे-धीरे कांग्रेस की जमीन खिसका दी। बलुवा और सुपौल जैसे इलाकों की राजनीतिक हैसियत तो बनी रही, लेकिन कांग्रेस का वर्चस्व कमजोर होता चला गया।सुपौल में इस रैली को लेकर खूब चर्रचा हो रही है। लोग कह रहे हैं कि ‘सुखी घास पर मायूस मानसून की बूंद’ की तरह, यह आयोजन कांग्रेस के लिए एक नई शुरुआत हो सकता है। बीजेपी और एनडीए खेमे ने इसे ‘ढकोसला यात्रा’ बताते हुए सवाल खड़े किए। कुल मिलाकर, मंगलवार की यात्रा ने यह साफ कर दिया कि बिहार की राजनीति में कांग्रेस अब केवल सहयोगी पार्टी बनकर संतुष्ट नहीं रहना चाहती, बल्कि नए जोश और चेहरों के साथ अपनी खोई जमीन वापस पाना चाहती है।