इश्क जब इबादत बन गया: मोतिहारी के इस मंदिर में भगवान नहीं, ‘जीवनसंगिनी’ की होती है पूजा; रोज लगता है चाय का भोग…

Ritu Raj

बिहार के पूर्वी चंपारण में मोहब्बत की एक ऐसी इबादतगाह तैयार हुई है, जो शाहजहाँ के संगमरमरी प्रेम से भी कहीं अधिक गहरी और ‘देसी’ है। चकिया के भुवन छपरा गांव में सेवानिवृत्त पंचायत सचिव बालकिशुन राम ने अपनी दिवंगत पत्नी शारदा देवी की याद में ₹65 लाख की लागत से एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया है। यह मंदिर पत्थर की निर्जीव दीवारें नहीं, बल्कि उस महिला को दिया गया एक ‘महा-सम्मान’ है, जिसने मजदूरी करके अपने पति का भविष्य संवारा था।

संघर्ष की बुनियाद पर खड़ा ‘प्रेम मंदिर’;
इस कहानी की जड़ें उस दौर में हैं जब बालकिशुन के पास न शिक्षा के पैसे थे, न सिर पर पिता का साया। उस मुश्किल वक्त में शारदा देवी उनकी ताकत बनीं। पति की पढ़ाई दोबारा शुरू कराने के लिए उन्होंने अपने गहने तक बेच दिए। खुद मजदूरी की ताकि पति पंचायत सचिव बन सकें। बालकिशुन भावुक होकर याद करते हैं कि उनकी पत्नी ने कभी महँगे कपड़ों की चाह नहीं की और ‘मार्कीन’ की साड़ी पहनकर उम्र काट दी।

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जब इबादत बन गई यादें;
2022 में, रिटायरमेंट से ठीक छह महीने पहले शारदा देवी का निधन हो गया। जुदाई के इस दर्द को बालकिशुन ने सृजन में बदल दिया। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति की पाई-पाई (₹65 लाख) लगाकर मंदिर बनवाया, जिसका उद्घाटन पर्यटन मंत्री ने किया।

आज इस मंदिर की दिनचर्या किसी देवस्थान जैसी है:
प्रतिमा: मंदिर में शारदा देवी की आदमकद प्रतिमा है।
भोग: रोज़ाना सुबह-शाम उन्हें उनकी पसंदीदा चाय का भोग लगाया जाता है।
श्रद्धा: दोपहर और रात का भोजन भी प्रतिमा के समक्ष ससम्मान रखा जाता है।

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