बिहार में एनडीए को स्पष्ट जनादेश मिले एक महीना बीत जाने के बावजूद सियासी माहौल पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। सतह पर स्थिरता के संकेतों के बीच अंदरखाने अटकलें, संकेत और संभावित बदलावों की चर्चाएं लगातार तेज हो रही हैं। इसी क्रम में ‘खरमास’ के बाद राज्य की राजनीति में बड़े फैसलों की संभावना जताई जा रही है। इस बीच दिल्ली में जेडीयू के शीर्ष नेताओं की हालिया बैठक ने राजनीतिक उत्तराधिकार को लेकर चल रही चर्चाओं को और हवा दे दी है, जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की उम्र और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए पार्टी के भविष्य की रणनीति पर मंथन होने की बात सामने आ रही है।
सूत्रों के मुताबिक, जेडीयू नेतृत्व चाहता है कि नीतीश कुमार के रहते ही उत्तराधिकार से जुड़ा सवाल सुलझा लिया जाए, ताकि पार्टी का मजबूत ईबीसी वोट बैंक किसी असमंजस या नेतृत्व संकट की भेंट न चढ़े। बिहार की कुल आबादी में 36.01 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला ईबीसी वर्ग लंबे समय से नीतीश कुमार की सियासत का सबसे भरोसेमंद आधार रहा है। जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने भी इस तरह की चर्चाओं की पुष्टि करते हुए कहा कि फिलहाल कोई आधिकारिक फैसला नहीं है, लेकिन पार्टी का रुख साफ है कि इस पर अंतिम निर्णय निशांत कुमार को ही लेना है। उन्होंने कहा कि राज्य को निशांत जैसे पढ़े-लिखे और युवा नेतृत्व की जरूरत है और पार्टी उनके फैसले का इंतजार कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीतिक जीवन के अंतिम चरण में प्रवेश करने के साथ ही जेडीयू के लिए नेतृत्व का स्पष्ट रोडमैप तय करना जरूरी हो गया है, और क्षेत्रीय दलों के इतिहास को देखते हुए यह जिम्मेदारी परिवार के भीतर से आने वाले चेहरे को सौंपना पार्टी के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है।
हाल के दिनों में निशांत कुमार की सार्वजनिक मौजूदगी ने सियासी हलकों में हलचल और तेज कर दी है। पटना एयरपोर्ट पर उन्हें जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा के साथ देखे जाने को पार्टी के भीतर एक अहम संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। जेडीयू सूत्रों का दावा है कि पार्टी का कोर वोटर वर्ग भी अब निशांत को नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाला सबसे उपयुक्त चेहरा मानने लगा है। उनकी सादगी, शांत स्वभाव और विवादों से दूरी को पार्टी के लिए “स्वीकार्य नेतृत्व” की खासियत बताया जा रहा है। पटना सहित कई इलाकों में लगे पोस्टर-बैनरों में भी निशांत को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग खुलकर दिखने लगी है। हालांकि इन तमाम संकेतों के बीच निशांत ने अब तक सार्वजनिक तौर पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन बीते एक साल में उनकी बढ़ती राजनीतिक सक्रियता, चाहे सामाजिक कार्यक्रमों में पार्टी नेताओं से संवाद हो या चुनाव के दौरान पिता के समर्थन में अपील। यह इस ओर इशारा कर रही है कि नीतीश कुमार के सत्ता में लौटने के बाद अब उनके अगले कदम को लेकर सियासी निगाहें और ज्यादा टिक गई हैं।