बिहार की राज्यसभा राजनीति में 16 मार्च का दिन बेहद अहम होने वाला है। पाँच सीटों के लिए होने जा रहे इस घमासान ने राज्य के सियासी पारे को चढ़ा दिया है। जहाँ सत्ता पक्ष अपनी मजबूती दिखा रहा है, वहीं विपक्षी खेमे ने पाँचवीं सीट को ‘प्रतिष्ठा की जंग’ बना दिया है।

एनडीए का पलड़ा भारी;
बिहार विधानसभा के मौजूदा गणित को देखें तो सत्तारूढ़ एनडीए (NDA) काफी सुविधाजनक स्थिति में है। संख्या बल में एनडीए के पास कुल 202 विधायकों का समर्थन हासिल है। जदयू से उम्मीदवार नीतीश कुमार और रामनाथ ठाकुर, भाजपा से नितिन नवीन और शिवेश राम, तथा राष्ट्रीय लोक मोर्चा से उपेंद्र कुशवाहा मैदान में हैं। वहीं, अपनी भारी संख्या के कारण एनडीए की चार सीटों पर जीत सुनिश्चित मानी जा रही है।

पाँचवीं सीट का समीकरण;
असली मुकाबला पाँचवीं सीट के लिए है, जहाँ राजद ने एडी सिंह को उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। राजद इस सीट को जीतने के लिए छोटी पार्टियों और निर्दलीयों के भरोसे है। राजद (25), कांग्रेस (6), वाम दल (3) और इंडियन पीपुल्स पार्टी (1) को मिलाकर कुल 35 विधायक साथ हैं। सबसे अहम बात की AIMIM के 5 विधायकों का रुख निर्णायक हो सकता है। अख्तरुल ईमान की तेजस्वी यादव से हालिया मुलाकात ने राजद की उम्मीदें जगा दी हैं।
क्या फिर बदलेगा इतिहास?
इस पूरे चुनाव में बसपा के इकलौते विधायक सतीश कुमार सिंह यादव ‘किंगमेकर’ की भूमिका में नजर आ रहे हैं। उनके इर्द-गिर्द चर्चाएं तेज होने की दो मुख्य वजहें हैं। बिहार में बसपा विधायकों का इतिहास रहा है कि वे चुनाव जीतने के बाद अक्सर बड़ी पार्टियों (राजद, जदयू या भाजपा) का दामन थाम लेते हैं। वर्ष 2000 से लेकर जमा खान के मंत्री बनने तक, बसपा के विधायक पाला बदलते रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने 2025 के विधानसभा चुनाव में महज 30 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। ऐसे में उनके भविष्य के सियासी कदम को लेकर अटकलें तेज हैं कि वे एनडीए का साथ देंगे या राजद के पाले में जाएंगे।