सिटी पोस्ट लाइव
बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति का त्योहार सिर्फ तिल-गुड़ और पतंगबाजी तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह हमेशा से ‘सियासी खिचड़ी’ पकने का मुख्य केंद्र रहा है। इस बार 14 जनवरी का दिन बेहद खास होने वाला है क्योंकि लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने एक ऐसे भव्य दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया है, जिसने राजद (RJD) के अंदरूनी समीकरणों से लेकर एनडीए (NDA) के खेमे तक हलचल मचा दी है।
लालू की विरासत और तेज प्रताप का दांव
दशकों पहले लालू प्रसाद यादव ने दही-चूड़ा भोज को एक बड़े राजनीतिक मंच के रूप में स्थापित किया था। लालू की अस्वस्थता और तेजस्वी यादव की इस तरह के पारंपरिक आयोजनों में कम दिलचस्पी के बीच, तेज प्रताप ने इस विरासत को अपने हाथ में ले लिया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या तेज प्रताप इस आयोजन के जरिए खुद को पार्टी के “सांस्कृतिक और पारंपरिक उत्तराधिकारी” के रूप में पेश कर तेजस्वी को सियासी मात देने की तैयारी कर रहे हैं?


NDA नेताओं को न्योता: नई फील्डिंग के संकेत?
तेज प्रताप का यह भोज इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विपक्षी खेमे के दिग्गजों को भी आमंत्रित किया है। तेज प्रताप खुद उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा और पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के आवास पहुंचे और उन्हें भोज का न्योता दिया। लगभग सभी एनडीए घटक दलों को भेजे जा रहे इस आमंत्रण को ‘बड़ी सियासी फील्डिंग’ माना जा रहा है।

भोज के बहाने शक्ति प्रदर्शन?
जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने तंज भरे लहजे में कहा है कि तेज प्रताप मौकों को भुनाना अच्छी तरह जानते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि तेज प्रताप का सरकारी आवास समर्थकों के सैलाब के लिए छोटा पड़ सकता है। सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि क्या इस भोज में तेजस्वी यादव शामिल होंगे? यदि तेजस्वी नहीं आते हैं, तो यह भाइयों के बीच की दूरी को और स्पष्ट करेगा, और यदि आते हैं, तो नेतृत्व किसका चमकेगा, यह बड़ा सवाल है।

प्रतीकात्मक संदेश और रणनीति
राजद के भीतर कुछ लोग इसे तेज प्रताप का मास्टरस्ट्रोक मान रहे हैं। जब लालू यादव राजनीति से दूर हैं और तेजस्वी पारिवारिक जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं, तब तेज प्रताप का कार्यकर्ताओं और अन्य दलों के नेताओं के बीच सक्रिय होना उनकी भविष्य की महत्वाकांक्षाओं को दर्शाता है। दही-चूड़ा के साथ ‘नमक’ रखने की चर्चा भी प्रतीकात्मक संदेश के रूप में ली जा रही है।
अब सबकी नजरें 14 जनवरी पर टिकी हैं। क्या यह दही-चूड़ा भोज बिहार की राजनीति में किसी नए ‘खेला’ की शुरुआत करेगा या फिर यह केवल एक परंपरा का निर्वाह है, इसका खुलासा मकर संक्रांति के दिन ही होगा।