‘सुशासन’ के शोर में दबी एक बेटी की चीख:जिसने सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया…

Ritu Raj

पत्र 1: मुख्यमंत्री के नाम (एक मरती हुई उम्मीद)
माननीय मुख्यमंत्री जी,
मैं वो ‘बेटी’ हूँ जिसे आपने पटना पढ़़ने भेजा था। जहानाबाद से आई थी तो झोले में किताबें कम, आपके वादे ज़्यादा थे। आपने कहा था—”पढ़ो, बढ़ो, बिहार बदल रहा है।” मैंने मान लिया। पर सर, उस रात हॉस्टल के कमरे में बिहार नहीं बदला, मेरी दुनिया उजड़ गई। जब मुझ पर दरिंदगी हो रही थी, मैं चिल्लाई—शायद आपको सुनाई नहीं दिया क्योंकि आपका ‘सुशासन’ बहुत शोर करता है। पुलिस ने मेरी लाश को ‘आत्महत्या’ का नाम देकर आपकी छवि बचा ली, पर सर, उस माँ का क्या जिसकी कोख उजड़ गई? क्या मेरी मौत भी आपके लिए सिर्फ एक ‘डाटा’ है? मैं तो चली गई, पर क्या अगली बार कोई बेटी पटना आने की हिम्मत करेगी? अगर मेरी माँ के आँसू नहीं पोंछ सकते, तो कम से कम ‘सुशासन’ के इस झूठे पोस्टर को फाड़ दीजिएगा। आपकी एक बेटी (जो अब सिर्फ एक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट है)

पत्र 2: गृह मंत्री के नाम (एक टूटा हुआ भरोसा)
चाचा जी,
मैंने आपको ‘चाचा’ कहा था क्योंकि आपने सीना ठोक कर कहा था कि अपराधी बिहार छोड़ देंगे। पर चाचा जी, अपराधी तो मेरे हॉस्टल की गैलरी में घूम रहे थे। जब मेरा जिस्म नोचा जा रहा था, तब आपके दावे कहाँ थे? आपके पुलिस महकमे ने मेरी मौत को ‘स्लीपिंग पिल्स’ का ड्रामा बताया। मेरे शरीर पर दांतों के निशान थे, खून था… पर आपकी पुलिस को सिर्फ ‘इमेज’ बचानी थी। एक गिरफ्तारी करके आप क्या साबित करना चाहते हैं? बाकी लोग किसके संरक्षण में खुले घूम रहे हैं? अगर यही सब आपकी अपनी बच्ची के साथ होता, तो क्या तब भी आपकी पुलिस इसे ‘सुसाइड’ कहने की हिम्मत करती? कुर्सी पर बैठकर इंसाफ की बातें करना आसान है चाचा, कभी उस बाप की आँखों में झाँकिए जिसके बुढ़ापे की लाठी आपने ‘सुसाइड’ के नाम पर तोड़ दी। आपकी भतीजी (जिसे व्यवस्था ने ‘फाइल’ बना दिया)

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पत्र 3: DGP के नाम (एक कड़ा सवाल)
माननीय DGP साहब,
सलाम! पर ये सलाम उस वर्दी को है जिसे मैंने रक्षक माना था, उस सिस्टम को नहीं जिसने मुझे जीते जी मार डाला और मरने के बाद मेरा चरित्र हनन किया।आपकी SIT, आपके IG, आपकी जांच—ये सब तब क्यों जागे जब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने आपके झूठ की धज्जियाँ उड़ा दीं? क्या खाकी का काम अब सच ढूंढना नहीं, बल्कि सत्ता की सुविधा के अनुसार सच गढ़ना रह गया है? मेरी सहेलियों से, मेरे माता-पिता से सवाल पूछने के बजाय, अपने उन अफसरों से पूछिए जिन्होंने बिना जांच के मुझे ‘सुसाइड’ का सर्टिफिकेट दे दिया था। जांच के नाम पर मेरे चरित्र को मत खंगालिए, अपने सिस्टम की सड़न को खंगालिए। मैं तो मर चुकी हूँ, पर याद रखिएगा—एक बेगुनाह की चीख तब तक पीछा नहीं छोड़ती जब तक इंसाफ न हो जाए। एक पूर्व छात्रा (जिसे पुलिस ने पहले ‘केस’ और फिर ‘साजिश’ बना दिया)

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