बिहार में ‘अदृश्य’ होती बेटियां: सरकार के लिए यह केवल एक ‘आंकड़ा’, परिवारों के लिए सिस्टम की बेरुखी…

Ritu Raj

बिहार सरकार और विपक्ष के बीच आंकड़ों की जंग जारी है। जहाँ विपक्ष अपराध बढ़ने का दावा कर रहा है, वहीं सरकार इसे ‘प्रेम-प्रसंग’ और ‘शादी की नीयत’ से जोड़कर देख रही है। 2024 में बिहार में अपहरण के 19,768 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 14 हजार से अधिक मामले लव-अफेयर और शादी की नीयत से घर से भगाने के हैं। – सम्राट चौधरी, गृह मंत्री, बिहार (12 फरवरी 2026)

चार कहानियां: सिस्टम की बेरुखी और परिवारों का दर्द
रिपोर्ट में शामिल ये चार मामले दर्शाते हैं कि पुलिस का रवैया अक्सर पीड़ितों के प्रति सहयोगात्मक होने के बजाय अपमानजनक होता है:
बेगूसराय/पटना मामला: 16 साल की छात्रा गायब हुई, तो पुलिस ने पिता से कहा— “पैसे खत्म होंगे तो खुद आ जाएगी।” जब मामला विधान परिषद में गूंजा, तब जाकर पुलिस सक्रिय हुई और लड़की बरामद हुई।
नवादा (शोभा देवी): दो बच्चों की मां का अपहरण हुआ। पिता का आरोप है कि आरोपी जबरन शादी करना चाहता है। पुलिस के पास अब तक कोई ठोस सुराग नहीं है।
मधुबनी मामला: 26 साल की युवती मंदिर गई और नहीं लौटी। 7 दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस की सुस्ती बरकरार है, जिससे परिवार अनहोनी की आशंका में है।
दरभंगा मामला: एक शादीशुदा व्यक्ति ने नाबालिग का अपहरण किया। आरोपी पहले जेल जा चुका था और धमकी दे रहा था, फिर भी पुलिस उसे रोक नहीं पाई।

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कानून क्या कहता है? (सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस)
एडवोकेट तान्या श्री के अनुसार, गुमशुदगी के मामलों में पुलिस की लापरवाही सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है। दरअसल, यदि कोई नाबालिग लापता होता है, तो पुलिस को BNS (भारतीय न्याय संहिता) के तहत तत्काल FIR दर्ज करनी अनिवार्य है। ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश हैं। वहीं, 18 साल से ऊपर के व्यक्ति के लापता होने पर पहले डायरी एंट्री और फिर FIR दर्ज करना आवश्यक है। पुलिस इसे दर्ज करने से मना नहीं कर सकती।

राजनीतिक प्रतिक्रिया;
पुलिस की असंवेदनशीलता दर्शाती है कि पीड़ितों को “ऐश-मौज करके लौट आएगी” जैसे ताने मारना पुलिस की कार्यशैली पर काला धब्बा है। राजद MLC सुनील सिंह और अब्दुलबारी सिद्दीकी ने सदन में सरकार को घेरते हुए कहा कि अपराध का ग्राफ 2004 के मुकाबले तीन गुना बढ़ गया है। इसके अलावा विपक्ष का आरोप है कि शराबबंदी के बाद ‘सूखे नशे’ और अवैध कमाई ने पुलिस के एक बड़े हिस्से को भ्रष्ट कर दिया है, जिससे वे बुनियादी सुरक्षा पर ध्यान नहीं दे पा रहे। लेकिन सरकारी आंकड़े चाहे जो भी तर्क दें, लेकिन जब तक एक लाचार पिता को अपनी बेटी खोजने के लिए सदन की दहलीज तक गुहार लगानी पड़े, तब तक सुरक्षा के दावे खोखले ही नजर आते हैं।

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