सिस्टम बेनकाब! NEET छात्रा मौत केस में पटना पुलिस पर गंभीर आरोप, पूर्व DGP की भूमिका पर भी उठे सवाल…

Ritu Raj

पटना में NEET की छात्रा की मौत अब किसी “संदिग्ध परिस्थिति” की कहानी नहीं रही। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि यह मामला आत्महत्या या अचानक तबीयत बिगड़ने का नहीं, बल्कि योजनाबद्ध यौन हिंसा और हत्या का है। शुरुआती जांच में जिस सच को दबाने की कोशिश हुई, वही सच अब मेडिकल साइंस की गवाही के साथ सामने खड़ा है।

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट बताती है कि छात्रा के शरीर पर मिली हर चोट मौत से पहले की है। यानी मरने से पहले वह जिंदा थी, होश में थी और पूरी ताकत से संघर्ष कर रही थी। गर्दन और कंधों के पास मिले अर्धचंद्राकार नाखूनों के गहरे निशान इस बात का संकेत हैं कि हमलावर ने उसे काबू में करने की कोशिश की और छात्रा ने आखिरी सांस तक विरोध किया। रिपोर्ट में छाती, कंधों और पीठ पर फैली खरोंचों और नीले निशानों का भी जिक्र है। डॉक्टरों के मुताबिक ये चोटें किसी एक झटके में नहीं आईं, बल्कि लंबे समय तक चली बर्बरता का नतीजा हैं। शरीर का किसी सख्त सतह से बार-बार टकराना और लगातार रगड़ के निशान इस आशंका को मजबूत करते हैं कि अपराध कुछ मिनटों का नहीं, बल्कि घंटों चला और इसमें एक से अधिक लोग शामिल हो सकते हैं। सबसे चौंकाने वाला खुलासा जननांगों की जांच में हुआ। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ताजा चोटें, गंभीर टिशू ट्रॉमा और अत्यधिक ब्लीडिंग दर्ज की गई है। मेडिकल बोर्ड ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि ये चोटें सहमति से बने संबंध की नहीं, बल्कि जबरन यौन हिंसा का परिणाम हैं। डॉक्टरों की राय में यदि सहमति होती, तो शरीर के अन्य हिस्सों पर इतने व्यापक संघर्ष के निशान नहीं मिलते। यहीं से पुलिस के शुरुआती दावों पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। घटना के बाद पुलिस ने कहा था कि यौन शोषण के कोई सबूत नहीं मिले, छात्रा बेहोश थी और मामला आत्महत्या का है। लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट इन सभी दावों को खारिज करती है। रिपोर्ट बताती है कि छात्रा होश में थी, उसने संघर्ष किया और उसके साथ यौन हिंसा हुई। अब इस मामले में साजिश की परतें भी खुलने लगी हैं। परिवार का आरोप है कि हॉस्टल संचालक की ओर से पैसे देकर समझौते की पेशकश की गई। अगर मामला आत्महत्या का था, तो समझौते की जरूरत क्यों पड़ी? पूछताछ के बाद तीन संदिग्धों को छोड़ देना भी सवालों के घेरे में है—क्या यह सबूतों की कमी थी या किसी दबाव का नतीजा? मृतका के मामा सुभाष कुमार ने पुलिस और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि छात्रा की मौत से पहले ही पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसे आत्महत्या घोषित कर दिया था। नींद की 90 गोलियां मिलने का दावा भी संदेह के घेरे में है, क्योंकि बिना डॉक्टर की पर्ची इतनी बड़ी मात्रा में दवाइयां मिलना आसान नहीं होता।

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परिजनों का आरोप है कि हॉस्टल मालिक, निजी अस्पताल प्रबंधन और स्थानीय थाना स्तर पर मामले को दबाने की कोशिश की गई। यहां तक कि केस रफा-दफा करने के लिए 15 लाख रुपये तक का ऑफर दिए जाने की बात भी सामने आई है। इसी वजह से परिवार ने स्थानीय प्रशासन पर भरोसा खो दिया है और न्याय के लिए अदालत का रुख किया है। अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद यौन शोषण से इनकार की कोई गुंजाइश नहीं बची है। यह रिपोर्ट न सिर्फ पूरे बिहार को झकझोरती है, बल्कि पटना पुलिस की शुरुआती थ्योरी को भी कठघरे में खड़ा करती है। ‘नींद की गोली और आत्महत्या’ की कहानी अब खुद सवालों के घेरे में है। बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद द्वारा उठाए गए सवालों ने भी पुलिस महकमे की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सवाल साफ है—क्या वरिष्ठ अधिकारियों को गलत जानकारी दी गई या बिना पूरी जांच के बयानबाजी की गई? पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले सुसाइड और मोबाइल सर्च हिस्ट्री की थ्योरी क्यों सामने लाई गई? अब जबकि मामला सार्वजनिक दबाव के बाद दोबारा जांच के दायरे में आया है, मोबाइल फोरेंसिक, सीसीटीवी फुटेज और एफएसएल रिपोर्ट का इंतजार है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—क्या यह जांच सच तक पहुंचेगी या फिर यह मामला भी सिस्टम की फाइलों में दफन हो जाएगा?

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