पटना में नीट छात्रा की संदिग्ध मौत ने बिहार की कानून-व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इंसाफ की मांग अब केवल बिहार तक सीमित नहीं है, बल्कि “जहानाबाद की निर्भया” के लिए आक्रोश की लपटें दिल्ली के इंडिया गेट तक पहुंचने वाली हैं। ऐसे में सबकी नजरें बिहार पुलिस के तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी जितेंद्र राणा पर टिकी हैं। बिहार की जनता और सोशल मीडिया पर एक्टिव हजारों युवा इस उम्मीद में हैं कि आईपीएस जितेंद्र राणा अपने पुराने तेवर दिखाएंगे और रसूखदारों के दबाव में आए बिना सच सामने लाएंगे। क्या ‘सिंघम’ छवि वाले राणा इस गुत्थी को सुलझा पाएंगे? यह आने वाला वक्त और उनकी अंतिम रिपोर्ट बताएगी।
कौन हैं आईपीएस जितेंद्र राणा?
जितेंद्र राणा 2005 बैच के बिहार कैडर के एक अनुभवी आईपीएस अधिकारी हैं। उन्हें बिहार पुलिस के सबसे “नो-नॉनसेंस” और साहसी अफसरों में गिना जाता है।
2015 का चर्चित वाकया: साल 2015 में जब जितेंद्र राणा पटना के एसएसपी थे, तब शहर में दंगे जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। हालात बेकाबू होते देख जितेंद्र राणा खुद AK-47 लेकर सड़कों पर उतर आए थे। उनके इस कड़े तेवर ने न केवल उपद्रवियों के हौसले पस्त किए, बल्कि शहर में शांति बहाल की।
दबंगों पर नकेल: बाहुबली विधायक अनंत सिंह समेत कई हाई-प्रोफाइल मामलों को उन्होंने जिस चतुराई और सख्ती से संभाला, उससे उनकी छवि एक निष्पक्ष अधिकारी की बनी।
वापसी: हाल ही में दिल्ली एयरपोर्ट पर CISF की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पूरी कर लौटे राणा वर्तमान में पटना रेंज (सेंट्रल रेंज) के आईजी हैं।

केस की पृष्ठभूमि: क्या हुआ था?
जहानाबाद की 18 वर्षीय छात्रा पटना के चित्रगुप्त नगर स्थित ‘शंभू गर्ल्स हॉस्टल’ में रहकर नीट की तैयारी कर रही थी।
6 जनवरी 2026: छात्रा अपने कमरे में बेसुध मिली।
11 जनवरी 2026: मेदांता अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
शुरुआती पुलिस थ्योरी: पुलिस ने इसे नींद की गोलियों का ओवरडोज और आत्महत्या बताया था, जिसे लेकर जनता में भारी आक्रोश है।
पोस्टमार्टम ने बदली कहानी: आत्महत्या या हत्या?
पुलिस की शुरुआती जांच पर तब सवाल उठे जब पीएमसीएच (PMCH) की पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आई। इस रिपोर्ट ने केस को पूरी तरह पलट दिया:
संघर्ष के निशान: शरीर पर नाखूनों की खरोंच और संघर्ष के स्पष्ट निशान पाए गए।
गंभीर आरोप: परिजनों ने इसे सामूहिक दुष्कर्म और हत्या का मामला बताते हुए आरोप लगाया कि निजी अस्पताल और स्थानीय पुलिस साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं।

आईजी जितेंद्र राणा की चुनौती:
जब स्थानीय पुलिस की साख पर बट्टा लगा, तो डीजीपी विनय कुमार ने केस की निगरानी आईजी जितेंद्र राणा को सौंपी। राणा के नेतृत्व में गठित एसआईटी (SIT) अब इन बिंदुओं पर काम कर रही है:
14 मिनट का रहस्य: छात्रा के स्टेशन से हॉस्टल पहुँचने के बीच के वे 14 मिनट बेहद अहम हैं।
डिजिटल साक्ष्य: हॉस्टल के डीवीआर (DVR) और सीसीटीवी फुटेज की फोरेंसिक जांच की जा रही है।
गिरफ्तारी: हॉस्टल मालिक मनीष कुमार रंजन को पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है।